November 29, 2019

कुलथी की दाल और उसके फायदे

कुलथी की दाल और उसके फायदे

Horse Gram in Hindi


हॉर्स ग्राम को हिंदी में कुल्थी की दाल के नाम से जानते हैं । या कहें कि अंग्रेजी में इस कुलथी दाल को Horse Gram कहा जाता है|

यह दाल भी दूसरे दालों के तरह प्रोटीन और पौष्टिकता से तो भरपूर है पर इसके बारे में कम लोग ही जानते हैं । कुल्थी की दाल का नाम अन्य दालों जैसे मूंग मसूर और अरहर की तरह फेमस नहीं है ।

लेकिन इस कुलथी दाल का उपयोग बहुत से रोगों के इलाज के लिए किया जाता रहा है इसलिए इसके चर्चे अक्सर बीमारी के समय सामने आ जाते हैं ।

Horse Gram Benefits


कुल्थी दाल के फायदे


Kidney Stone गुर्दे की पथरी के लिए लाभदायक होती है कुलथी दाल

कुलथी की दाल का जिक्र अक्सर तब आता है जब किसी के गुर्दो में पथरी की शिकायत होती है । कुलथी दाल किडनी पत्‍थरों को नष्‍ट करने में मदद करती है।

कुलथी दाल पथरी बनने से रोकती है । कुलथी दाल में मूत्रवर्धक गुण होते हैं जो कि किडनी के पत्‍थरों को मूत्र के साथ बाहर निकालने में मदद करता है|

कुलथी दाल का उपयोग किडनी समस्‍याओं के उपचार के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद है|

इन वजहों से खराब होती है किडनी

गुर्दे की पथरी में बरतें सावधानी

मोटापे को रोकने में सहायक है कुलथी दाल । कुलथी दाल का उपयोग करने से शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल को कम किया जा सकता है जो मोटापे का मुख्य कारण है ।

पौष्टिकता और आयरन की कमी होने पर इस दाल का प्रयोग काफी फायदेमंद होता है यह आयरन की कमी को पूरी करती है। महिलाओं में आयरन की कमी होने पर इसे लेने से महिलाओं में आयरन पूर्ति होती है और साथ साथ होने वाले शिशु के विकास में भी मदद मिलती है|

मधुमेह में कुलथी के कच्चे बीज भिगोकर खाना बहुत ही अच्छा होता है| पाचन सम्बन्धी समस्या को सही करती है कुल्थी की दाल ।

November 28, 2019

महाराष्ट्र में ठाकरे सरकार

महाराष्ट्र में ठाकरे सरकार

महाराष्ट्र को मिला मुख्यमंत्री


बड़ी सियासी उठापठक के बाद आखिर महाराष्ट्र में फिर से नई सरकार बन ही गई । इस बार बाजी शिवसेना ने मारी है ।

महाराष्ट्र में 19वें मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव ठाकरे ने गुरुवार शाम को शपथ ली ।

आज शिवाजी पार्क स्टेडियम में  मराठी भाषा में उद्धव ठाकरे ने सीएम पद की शपथ ली ।

ठाकरे परिवार से पहली बार कोई महाराष्ट्र के सीएम की कुर्सी पर बैठा है ।

59 साल के उद्धव ठाकरे कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर महाराष्ट्र को चलाएंगे , ये तीनों दलों की मिलीजुली सरकार होगी ।

उद्धव ठाकरे के साथ-साथ तीनों पार्टियों के छह नेताओं ने भी कैबिनेट मंत्री के रूप में शपथ ली ।

नए बनाए गए मंत्री


शिवसेना से एकनाथ शिंदे और सुभाष देसाई, NCP से जयंत पाटिल और छगन भुजबल, कांग्रेस से बालासाहेब थोराट और नितिन राउत कैबिनेट मंत्री बनाए गए हैं ।

जयंत राजाराम पाटिल इस्लामपुर वालवा विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। वह पृथ्वीराज चव्हाण सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री रहे हैं।

इससे पहले वह वित्त मंत्री और गृह मंत्री भी रहे हैं।

छगन भुजबल एनसीपी के दिग्गज नेता हैं। भुजबल महाराष्ट्र के पूर्व उप मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

बाला साहेब थोराट कांग्रेस के दिग्गज नेता 8 बार विधायक रह चुके हैं और वर्तमान में महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस समिति के प्रमुख हैं ।

सुभाष देसाई शिवसेना के वरिष्ठ नेता 1990, 2004 और 2009 में विधायक रह चुके हैं । 2014 में महाराष्ट्र के उद्योग मंत्री संभाल चुके हैं ।

एकनाथ शिंदे शिवसेना के विधायक दल के नेता हैं । जिन्हें अजीत पवार की जगह विधायक दल का नेता बनाया है ।

दलित नेता नितिन राउत को भी मंत्री बनाया गया है । नितिन राउत महाराष्ट्र सरकार में पहले भी कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं ।

सरकार बनते ही काम शुरू


शपथ ग्रहण के बाद उद्धव ठाकरे सिद्धि विनायक मंदिर में पूजा करने पहुँचे, उसके बाद उन्होंने सहयाद्री गेस्ट हाउस में अपनी पहली कैबिनेट बैठक ली ।


कैबिनेट मीटिंग से बाहर आने के बाद पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि मैं राज्य के लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि हम एक अच्छी सरकार देंगे ।


पहली कैबिनेट बैठक में छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रायगढ़ किला के संरक्षण के लिए 20 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं ।


 

November 23, 2019

जानिए कैसे बने रातों रात मुख्यमंत्री, सत्ता है तभी संभव है

जानिए कैसे बने रातों रात मुख्यमंत्री, सत्ता है तभी संभव है

सत्ता है तभी संभव है


समर्थ का नहीं दोष गुसाईं , कहावत तो सुनी ही होगी । ऐसा ही कुछ सामने आया महाराष्ट्र में जब रातों रात राष्ट्रपति शाशन हट गया और मुख्यमंत्री बन गया ।


एक तरफ जहाँ पहले पार्टियों से सभी विधायकों के हस्ताक्षर करके समर्थन पत्र लाने को बोला गया था तो अभी रातों रात एनसीपी के लेटर (विधायको के हस्ताक्षर पत्र) को शिवसेना की जगह बदलकर भाजपा को दे दिया और सीधे गुप चुप शपथ ग्रहण हो गया ।


सत्ता है तो सब संभव है और सत्ता के लिए भी सब संभव है ये है राजनीति का मूल मंत्र ।



कुछ घण्टो में बदले समीकरण


शुक्रवार की  रात तक कोई नहीं जानता था कि महाराष्ट्र में क्या घटित होने जा रहा है । शुक्रवार शाम तक  कई दौर की बैठकों के बाद  शिवसेना काँग्रेस और एनसीपी के बीच तय हो चुका था कि महाराष्ट्र के नए सीएम उद्धव ठाकरे होंगे।


किस नेता को क्या जिम्मेदारी दी जाएगी इस पर भी फैसला हो चुका था । तीनों दल मिलकर शनिवार को सरकार बनाने का दावा पेश करने वाले थे ।


खबरों के मुताबिक तय हुआ था कि शिवसेना  के प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनेंगे और दो डिप्टी सीएम कांग्रेस और एनसीपी के बनेंगे ।



रात भर चला सियासी राजनैतिक ड्रामा


लेकिन रात को कुछ ऐसा सियासी ड्रामा हुआ जो आज तक कभी नहीं हुआ । भाजपा ने  एनसीपी नेता अजित पवार को पटा लिया और सुबह उन्होंने फडनविस के साथ राजभवन पहुंचकर डिप्टी सीएम पद की शपथ ले ली ।


न्यूज एजेंसी ANI ने सुबह 8 बजे जब पहला ट्वीट किया कि देवेंद्र फडणवीस ने राजभवन पहुंचकर सीएम पद की शपथ लेने जा रहे हैं  तो पहले सबको ऐसा लगा कि यह गलत जानकारी दी गई है ।


लेकिन फिर एजेंसी द्वारा सारा ब्यौरा सामने आने लगा अचानक से टीवी न्यूज चैनलों में देवेंद्र फडणवीस के शपथ लेने की तस्वीरें आने लगीं ।



पर आखिर रातों रात ऐसा हुआ क्या ?


जैसे ही शाम को एनसीपी के द्वारा घोषणा हुई कि गठबंधन सरकार बनाने जा रहा है तो भाजपा सक्रिय हुई और रात में ही अजित पवार और बीजेपी में डील पक्की हुई ।


देवेंद्र फडणवीस ने अजित पवार को अपने पास ही रखा कहीं जाने नहीं दिया जिससे शिवसेना और कांग्रेस में किसी को पता नहीं लगने पाए ।


मध्य रात्रि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी जी को उनकी नई दिल्ली के लिए यात्रा रद्द करनी पड़ी ।


रात में ही राज्यपाल ने सचिव को राष्ट्रपति शासन हटाने की अधिसूचना जारी करने के आदेश दिए । भाजपा द्वारा शपथ ग्रहण की तैयारी गुपचुप की गई ।


सुबह  देवेंद्र फडणवीस अपने साथ अजित पवार को लेकर  राजभवन पहुंच गए और सुबह 7:50 बजे शपथ ग्रहण शुरू हो गया ।


जब मीडिया में खबर आई टैब जाकर एनसीपी और काँग्रेस को इसकी जानकारी हुई । सुबह 8:16 बजे पीएम मोदी ने सीएम और डिप्टी सीएम को बधाई दी ।



क्या हुई गुपचुप डील :


अभी तक साफ साफ नहीं पता चला है कि देवेंद्र फड़नवीस और अजीत पवार के बीच क्या डील हुई है । क्या सिर्फ डिप्टी पद के लिए अजीत पवार ने ऐसा किया या कुछ और भी है ।


हालांकि शिवसेना ने साफ साफ आरोप लगाया है कि ईडी जाँच की धमकी के बाद अजीत पवार ने ऐसा किया है ।



विपक्षी पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस :


शरद पवार ने मीडिया से कहा कि न ही एनसीपी के विधायक और न ही कार्यकर्ता बीजेपी ज्वाइन करेंगे , सच्चे कार्यकर्ता कभी बीजेपी से हाथ नहीं मिलाएंगे।


10 या 11 विधायक अजित पवार के साथ  हैं इन विधायकों के खिलाफ जो ऐक्शन लेना होगा लेंगे ।  बीजेपी को समर्थन एनसीपी ने नहीं दिया अजित पवार ने दिया है ।


शरद पवार ने कहा कि देवेंद्र फडणवीस सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे


महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 21 अक्टूबर को चुनाव हुए थे और 24 अक्टूबर को परिणाम आए थे।


 चुनाव में बीजेपी को 105, शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं।


सरकार न बन पाने के बाद 12 नवंबर को  राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था ।


उसके बाद शिवसेना काँग्रेस और एनसीपी की सरकार बनाने के लिए बैठकों का दौर लगातार चल रहा था ।

November 20, 2019

मोबाइल डेटा की बढ़ेंगी रेट देने होंगे ज्यादा रुपए

मोबाइल डेटा की बढ़ेंगी रेट देने होंगे ज्यादा रुपए
टेलीकॉम कंपनियों को एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) मामले में पेनल्टी और ब्याज में छूट देने के प्रस्ताव पर सरकार फिलहाल कोई विचार नहीं कर रही।

दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बुधवार को लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में ये जानकारी दी।

आने वाले समय में भारतीय ग्राहकों को डेटा के लिए ज़्यादा रकम चुकानी पड़ सकती है । ऐसा इसलिए क्योंकि दो प्रमुख टेलिकॉम कंपनियों ने जल्द ही मोबाइल डेटा का दाम बढ़ाने की घोषणा की है।

भारत देश में मोबाइल डेटा की दरें दुनिया में सबसे कम हैं। यहां पर चीन, जापान से भी सस्ता मोबाइल डेटा मिलता है।

भारतीय बाज़ार में एयरटेल और वोडाफ़ोन-आइडिया की राजस्व के मामले में आधे से ज़्यादा हिस्सेदारी है ये दोनों ही कंपनियां जल्द ही मोबाइट डेटा को महंगा करने वाली हैं।

हाल ही में दोनों कंपनियों ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 10 अरब डॉलर का घाटा दिखाया है।

ऊपर से सुप्रीम कोर्ट ने एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (एजीआर) मामले में पेनल्टी और ब्याज के एक पुराने मामले को निपटाते हुए हाल ही में आदेश दिया है कि सभी टेलिकॉम कंपनियों को 90,000 करोड़ रुपए की रकम सरकार को देनी होगी ।

वोडाफ़ोन आइडिया 1 दिसंबर 2019 से अपने टैरिफ़ की दरें  बढ़ाएगा एयरटेल की ओर से भी इसी तरह का बयान जारी किया गया है।

पहले टेलिकॉम सेक्टर में कई कंपनियां थीं और उनमें प्रतियोगिता के कारण डेटा की क़ीमतें गिरी थीं ।

क्योंकि दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में भारत में ग्राहकों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही थी यहां के ग्राहक हर महीने डेटा पर बेशक कम ख़र्च करते हैं लेकिन इनकी संख्या इतनी है कि कम्पनी की कमाई अच्छी हो जाती थी।

आज कम्पनी नुक्सान में चली गई हैं नुक़सान की भरपाई के लिए स्वाभाविक है कि डेटा की क़ीमत बढ़ेगी ।कंपनियां अंदाजन लगभग 15 से 20 प्रतिशत रेट बढ़ा सकतीं हैं।

यानि अभी आप महीने में 100 रुपए खर्च कर रहे हैं तो आपको लगभग 120 रुपए खर्च आ सकता है।

टेलिकॉम कंपनिया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला  आने के बाद उन्हें भारी-भरकम लंबित रक़म सरकार को चुकानी होगी और इसका सीधा असर ग्राहक पर ही होगा ।

 

November 19, 2019

Swift Code, BIC Code

Swift Code, BIC Code

What are SWIFT or BIC codes?


SWIFT stands for “Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication”. It is a member-owned cooperative that is used by the financial world to conduct business operations.

SWIFT codes are most commonly used for international wire transfers and are comprised of 8 or 11 alphanumeric characters.

The swift code is usually required for money transfers between two different banks in different Countries (that are members of the swift network).

For Fund Transfer from foreign country We are not only asked to provide the beneficiary’s bank account number or IBAN account number that we want to send money to, but we must also provide the Swift Code or BIC code of the branch of the beneficiary’s bank.

Swift codes are handled by the SWIFT organization, and in particular from a division called “SWIFT Standards”. These codes were initially referred to as “swift codes” but were later standardized as BIC which stands for “Business Identifier Codes”.

Both terms are used today and mean exactly the same thing: a BIC code is a unique alphanumeric identification code, consisting of combinations of letters and numbers, which is used to uniquely identify an institution's branch among the members of the swift network.

Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication code An internationally-recognized identification code for banks around the world. The International Organization of Standardization (IOS) was the authoritative body that approved the creation of SWIFT codes.

BIC (Business Identifier Code) is an international standard for routing business transactions and identifying business parties

Understanding the code


A swift code consists of 11 or 8 characters, which is the standard format standardized by ISO (International Organization for Standardization).

For example :


Swift code: MAHBINBBLUD  is the swift code for Bank of Maharashtra can be broken down to four parts:  MAHB     IN      BB     LUD

 

  • First four characters: MAHB identify the bank BANK OF MAHARASHTRA. This 4-letter code is used to identify this particular financial institution all over the world.


 

  • Fifth and sixth characters: These 2 characters identify the country in which the bank is located. IN in this example means INDIA.


 

  • Seventh and eighth characters: These 2 characters represent a location code (“BB” in this example).


 

  • Last three characters: These 3 characters form the branch code. (“LUD” in this example used for LUDHIYANA Branch). But this particular branch code is optional, and if omitted,


  • The 8-character remaining code is assumed to refer to the head office of the institution. (MAHBINBB in our example).


 

The Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication (SWIFT) (also known as ISO 9362, SWIFT-BIC, BIC code, SWIFT ID or SWIFT code) is a standard format of Business Identifier Codes approved by the International Organization for Standardization (ISO).

 

It is a unique identification code for both financial and non-financial institutions. These codes are used when transferring money between banks, particularly for international wire transfers, and also for the exchange of other messages between banks.

The codes can sometimes be found on account statements. SWIFT and BIC codes are basically the same.

 

November 13, 2019

पंडित जवाहर लाल नेहरू

पंडित जवाहर लाल नेहरू

चाचा नेहरू


स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को इलाहाबाद में हुआ था।

पंडित नेहरू जी के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है क्योंकि बच्चों के प्रति उनका बहुत लगाव था भारतीय बच्चे उन्हें चाचा नेहरू के रूप में जानते हैं।

उनके पिता मोतीलाल नेहरू एक धनी बैरिस्टर थे जो कश्मीरी पण्डित थे और स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए।

उनकी माता स्वरूपरानी थुस्सू जो लाहौर के कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थी और मोतीलाल जी की दूसरी पत्नी थी । पहली पत्नी की प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी।

जवाहरलाल तीन बच्चों में से सबसे बड़े थे, जिनमें बाकी दो लड़कियां थी। बड़ी बहन, विजया लक्ष्मी, बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी, छोटी बहन कृष्णा हठीसिंग, एक उल्लेखनीय लेखिका बनी ।

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने घर पर निजी शिक्षकों से प्राप्त की। पंद्रह साल की उम्र में वे इंग्लैंड चले गए और हैरो में दो साल रहने के बाद ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज लंदन में उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया जहाँ से उन्होंने स्नातक की डिग्री प्राप्त की।

जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए।

1916 में वे महात्मा गांधी से पहली बार मिले जिनसे वे काफी प्रेरित हुए।

राजनीति में नेहरू जी 1919 में आए जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए।

नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल नेहरू ने पश्चिमी कपड़ों और महंगी संपत्ति का त्याग कर खादी कुर्ता और गांधी टोपी को अपनाया ।

1919 में इलाहाबाद के होम रूल लीग के सचिव बने। उन्होंने 1920 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में पहले किसान मार्च का आयोजन किया।

जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।इस दौरान उन्हें दो बार जेल भी जाना पड़ा।

जवाहरलाल नेहरू 1924 में इलाहाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में दो वर्ष तक सेवा की। 1926 में उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों से सहयोग की कमी का हवाला देकर त्यागपत्र दे दिया।

1926 से 1928 तक, जवाहर लाल नेहरू ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव रहे।

1928-29 में, कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया। उस सत्र में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस ने पूरी राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग का समर्थन किया ।

1929 में पंडित नेहरू भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन के लाहौर सत्र के अध्यक्ष चुने गए जिसका मुख्य लक्ष्य देश के लिए पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था।

26 जनवरी 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। महात्मा गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। आंदोलन खासा सफल रहा ।

उन्होंने 14 फ़रवरी 1935 को अल्मोड़ा जेल में अपनी ‘आत्मकथा’ का लेखन कार्य पूर्ण किया।

नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए 1936 और 1937 में चुने गए थे। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड़ दिया गया।

इसी बार उन्हें सबसे लंबे समय तक जेल में समय बिताना पड़ा। यह अंतिम मौका था जब उन्हें जेल जाना पड़ा एवं अपने पूर्ण जीवन में वे नौ बार जेल गए।

6 जुलाई 1946 को वे चौथी बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए एवं फिर 1951 से 1954 तक तीन और बार वे इस पद के लिए चुने गए।

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री


1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने अंग्रेजी सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भागीदारी की।

उन्होंने भारत के एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर 1964 में अपने निधन तक, भारत का शासन किया।

सन् 1947 में आजादी के बाद जब प्रधानमन्त्री के लिये कांग्रेस में मतदान हुआ तो तो सरदार पटेल को सर्वाधिक मत मिले दूसरे नम्बर पर आचार्य कृपलानी को मत मिले।

किन्तु महात्मा गांधी के कहने पर सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमन्त्री बनाया गया।

स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री का पद संभालने के लिए कांग्रेस द्वारा नेहरू निर्वाचित हुए, अंग्रेजों ने करीब 500 रजवाड़ों को स्वतंत्र किया था और उस समय सबसे बडी चुनौती थी उन्हें एक झंडे के नीचे लाना।

सभी राजा रजवाड़ो को एक साथ लाने में सरदार बल्लभ भाई पटेल के साथ बहुत खूबसूरती से कार्य किया ।

उन्होंने योजना आयोग का गठन किया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया और तीन लगातार पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया।

उनकी नीतियों के कारण देश में कृषि और उद्योग का एक नया युग शुरु हुआ। नेहरू ने भारत की विदेश नीति के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभायी।

नेहरू के नेतृत्व में, कांग्रेस ने राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय चुनावों में प्रभुत्व दिखाते हुए और 1951, 1957, और 1962 के लगातार चुनाव जीते ।

उनके अन्तिम वर्षों में राजनीतिक संकटों और 1962 के चीनी-भारत युद्ध में उनके नेतृत्व की असफलता के बाद भी , वे भारत में लोगों के बीच लोकप्रिय बने रहे ।

नेहरू ने चीन की तरफ मित्रता का हाथ भी बढाया, लेकिन 1962 में चीन ने धोखे से आक्रमण कर दिया। नेहरू के लिए यह एक बड़ा आघात था ।

उन्हें वर्ष 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू का देहावसान हो गया ।

कब और क्यों लगता है राष्ट्रपति शाशन

कब और क्यों लगता है राष्ट्रपति शाशन

राष्ट्रपति शासन से जुड़े प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 356 में दिए गए हैं । अनुच्छेद 356, केंद्र सरकार को किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने और राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुमति उस अवस्था में देता है, जब राज्य का संवैधानिक तंत्र पूरी तरह विफल हो गया हो।


आर्टिकल 356 के मुताबिक राष्ट्रपति किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकते हैं यदि वे इस बात से संतुष्ट हों कि राज्य सरकार संविधान के विभिन्न प्रावधानों के मुताबिक काम नहीं कर रही है । ऐसा जरूरी नहीं है कि राष्ट्रपति उस राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर ही यह फैसला लें ।


केंद्र सरकार की सलाह पर अथवा  अपने विवेक पर राज्यपाल सदन को भंग कर सकते हैं यदि सदन में किसी पार्टी या गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत ना हो।


राष्ट्रपति शाशन के दौरान प्रशासनिक दृष्टि से राज्य के राज्यपाल को केंद्रीय सरकार द्वारा कार्यकारी अधिकार प्रदान किए जाते हैं ।


प्रशासन में मदद करने के लिए राज्यपाल सलाहकारों की नियुक्ति करता है, जो आम तौर पर सेवानिवृत्त सिविल सेवक होते हैं ।


राज्यपाल सदन को छह महीने की अवधि के लिए ‘निलंबित अवस्था' में रख सकते हैं। छह महीने के बाद, यदि फिर कोई स्पष्ट बहुमत प्राप्त ना हो तो उस दशा में अगले छह माह के लिए आगे बढ़ा सकते हैं अथवा पुन: चुनाव आयोजित किये जाते हैं।


यदि संसद के दोनों सदनों द्वारा राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन कर दिया जाता है तो राष्ट्रपति शासन 6 माह तक चलता रहेगा, इस प्रकार 6-6 माह कर इसे 3 वर्ष तक आगे बढ़ाया जा सकता है ।


राष्ट्रपति शाशन के उपरान्त दो माह के अंदर इसका दोनों सदनों लोकसभा व राज्यसभा में अनुमोदन करना आवश्यक है । यदि लोकसभा भंग हो जाती है तो राज्यसभा द्वारा अनुमोदन किए जाने के बाद नई लोकसभा गठन के एक महीने के भीतर अनुमोदन किया जाना जरूरी है ।


अनुच्छेद 356 एक साधन है जो केंद्र सरकार को किसी नागरिक अशांति जैसे कि दंगे जिनसे निपटने में राज्य सरकार विफल रही हो की दशा में किसी राज्य सरकार पर अपना अधिकार स्थापित करने में सक्षम बनाता है ।


1950 में भारतीय संविधान के लागू होने के बाद से केन्द्र सरकार द्वारा इसका प्रयोग 100 से भी अधिक बार किया गया है।


राष्ट्रपति शाशन के दौरान राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति के नाम पर राज्य सचिव की सहायता से अथवा राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किसी सलाहकार की सहायता से राज्य का शासन चलाता है ।


राष्ट्रपति द्वारा मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रीपरिषद् को भंग करके राज्य सरकार के कार्य अपने हाथ में ले लिए जाते हैं और उसे राज्यपाल और अन्य कार्यकारी अधिकारियों की शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं ।

November 11, 2019

कैसे बन पाएगी महाराष्ट्र में शिवसेना सरकार

कैसे बन पाएगी महाराष्ट्र में शिवसेना सरकार
महाराष्ट्र में भाजपा के सरकार न बना पाने के बाद अब शिवसेना को मौका मिला है । शिवसेना सरकार बनाने के लिए एनसीपी और काँग्रेस के साथ संपर्क बनाए हुए है ।

भाजपा चाहती तो शिवसेना को समर्थन देकर 50-50 के फार्मूले से सरकार बना सकती थी लेकिन उसने गठबंधन तोड़ना ठीक समझा है ।

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने महाराष्ट्र कांग्रेस के नेताओं के साथ बैठक की है बैठक के बाद यह तय हुआ है कि महाराष्ट्र में शिवसेना  को कांग्रेस समर्थन देगी ।

खबर के अनुसार एनसीपी नेता शरद पवार के पास कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने फोन पर समर्थन की सहमति दे दी है ।  लेकिन पुख्ता रूप से अभी कोई घोषणा नहीं हुई है ।

उधर कांग्रेस पार्टी के विधायकों की बैठक राजस्थान में जारी है जहाँ अशोक गहलोत के साथ विधायकों की मंत्रणा जारी है और समर्थन बाहर से देना है या सरकार में शामिल होना है इस पर बातचीत जारी है ।

एनसीपी ने कहा था कि हम सरकार बनाने को लेकर कोई भी फैसला कांग्रेस से बात किए बगैर नहीं करने जा रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने महाराष्ट्र के मौजूदा राजनीतिक हालात को लेकर CWC की बैठक बुलाई थी अभी समर्थन कैसे देना है पता नहीं चला है ।

उधर काँग्रेस के एनडीए से अलग रहने की कहने पर केंद्र की मोदी सरकार में शामिल शिवसेना के इकलौते मंत्री अरविंद सावंत ने इस्तीफे का ऐलान किया था ।

इस्तीफे के फैसले पर ट्वीट करते हुए उन्होंने कहा था कि शिवसेना का पक्ष सच्चाई है। झूठे माहौल के साथ नहीं रहा सकता है । अरविंद सावंत के इस्तीफे के ऐलान के साथ ही तय हो गया है कि शिवसेना एनडीए से बाहर हो गई है।

शिवसेना और बीजेपी की दोस्ती 30 साल पुरानी थी, माना जा रहा है कि एनसीपी ने महाराष्ट्र में साथ सरकार बनाने के लिए शिवसेना के सामने शर्त रखी थी कि उसे पहले एनडीए से नाता तोड़ना होगा ।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव मे बीजेपी को 105, शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली हैं। बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर बहुमत का 145 का आंकड़ा पार कर लिया था।

लेकिन शिवसेना अपने 50-50 फॉर्मूले पर अड़ गई जबकि भाजपा का कुर्सी मोह भी न टूटा । की शिवसेना का कहना है कि बीजेपी के साथ समझौता इसी फॉर्मूले पर हुआ था लेकिन बीजेपी का दावा है कि ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ ।

इसी लेकर मतभेद इतना बढ़ा कि दोनों पार्टियों की 30 साल पुरानी दोस्ती टूट गई शिवसेना और बीजेपी की दोस्ती 30 साल पुरानी थी ।

शिवसेना के अनुसार वे पिछले 30 साल  से भाजपा को उसकी इच्छा अनुसार अपनी इच्छाएं दबाकर समर्थन किए जा रहे थे । पिछली बार भी अधिक सीट माँगने पर भाजपा से चिक चिक हुई थी ।

शिवसेना का कहना है कि इस बार भी विधानसभा चुनाव के दौरान जो गठबंधन बना वो 50-50 के फार्मूले पर बना लेकिन चुनाव नतीजों के बाद भाजपा की नीयत डोल गई ।

उधर भाजपा के अनुसार 50-50 पर कोई बात नहीं हुई थी ।
देखने वाली बात यह है कि दोनों ही पार्टियाँ कुर्सी नहीं छोड़ना चाहतीं ।

एक तरफ देवेंद्र फडणवीस को सरकार बनाने का न्योता मिलने के बाद भाजपा मान रही थी कि हर बार की तरह शिवसेना मान जाएगी । लेकिन इस बार शिवसेना भी अपनी बात 50-50 को दोहराती हुई अपनी जिद पर अड़ गए हैं ।

अड़ने की वजह यह भी है कि उनको NCP और कांग्रेस से समर्थन मिल जाने की उम्मीद है । माना जा रहा है कि एनसीपी ने महाराष्ट्र में साथ सरकार बनाने के लिए शिवसेना के सामने शर्त रखी थी कि उसे पहले एनडीए से नाता तोड़ना होगा ।

और भाजपा के जिद पर अड़े रहने के बाद अब एनडीए से शिवसेना का निकल जाना लगभग तय हो गया है । शिवसेना नेताओं का कहना है कि 30 साल से वे एक तरफा दोस्ती निभा रहे थे और हर बार झुकते आ रहे थे ।

कुलमिलाकर शिवसेना को अगर काँग्रेस और एनसीपी के समर्थन मिल जाता है तो शिवसेना का मुख्यमंत्री बनना तय है । जिसकी पहली शर्त यह है कि कोई सीनियर ही मुख्यमंत्री पद के लिए चुना जाएगा ।

जिसके बाद उद्धव ठाकरे के नाम को ही मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जा रहा है । कल तक सभी अटकलें खत्म होकर सरकार बनाने का फॉर्मूला जाहिर हो जाएगा ।

कैसे टूटी 30 साल की दोस्ती

कैसे टूटी 30 साल की दोस्ती
शिवसेना और बीजेपी (Shivsena - BJP) की दोस्ती 30 साल पुरानी थी । शिवसेना के अनुसार वे पिछले 30 साल  से भाजपा को उसकी इच्छा अनुसार अपनी इच्छाएं दबाकर समर्थन किए जा रहे थे । पिछली बार भी अधिक सीट माँगने पर भाजपा से चिक चिक हुई थी ।

शिवसेना का कहना है कि इस बार भी विधानसभा चुनाव के दौरान जो गठबंधन बना वो 50-50 के फार्मूले पर बना लेकिन चुनाव नतीजों के बाद भाजपा की नीयत डोल गई ।

उधर भाजपा के अनुसार 50-50 पर कोई बात नहीं हुई थी ।

देखने वाली बात यह है कि दोनों ही पार्टियाँ कुर्सी नहीं छोड़ना चाहतीं । एक तरफ देवेंद्र फडणवीस को सरकार बनाने का न्योता मिलने के बाद भाजपा मान रही थी कि हर बार की तरह शिवसेना मान जाएगी ।

लेकिन इस बार शिवसेना भी अपनी बात 50-50 को दोहराती हुई अपनी जिद पर अड़ गए हैं । अड़ने की वजह यह भी है कि उनको NCP और कांग्रेस से समर्थन मिल जाने की उम्मीद है ।

माना जा रहा है कि एनसीपी ने महाराष्ट्र में साथ सरकार बनाने के लिए शिवसेना के सामने शर्त रखी थी कि उसे पहले एनडीए से नाता तोड़ना होगा ।

और भाजपा के जिद पर अड़े रहने के बाद अब एनडीए से शिवसेना का निकल जाना लगभग तय हो गया है ।

शिवसेना नेताओं का कहना है कि 30 साल से वे एक तरफा दोस्ती निभा रहे थे और हर बार झुकते आ रहे थे । सामने वाला (भाजपा) एक बार भी दोस्ती अपनी तरफ से निभाने को तैयार नहीं । ऐसे में इस प्रकार की दोस्ती का कोई मतलब नहीं रह जाता ।

शिवसेना ने यह भी कहा कि मौका परस्त भाजपा तो कुर्सी के लिए पीडीपी जैसी पार्टी से भी गठबंधन कर लेती है । पर दोस्त पार्टी को ढाई साल के लिए कुर्सी न दे सकी ।

November 10, 2019

एनएसए अजीत डोभाल की धर्म गुरुओं से मुलाकात

एनएसए अजीत डोभाल की धर्म गुरुओं से मुलाकात
आज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने धार्मिक नेताओं के साथ बैठक की । डोभाल के आवास पर हुई इस बैठक में योग गुरु बाबा रामदेव, स्वामी परमात्मानंद, शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद और महमूद मदनी समेत कई अन्य मौजूद रहे ।

अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बैठक काआज का मुख्य मुद्दा यही था कि कैसे देश में अमन और शांति बनी रहे ।

इससे पहलेअयोध्या विवाद पर फैसले के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने अजीत डोभाल के साथ बैठक की थी देश मे सतर्कता और सजगता बनाए रखने पर लगातार कार्य जारी है ।

अयोध्या पर फैसले के मद्देनजर देशभर में खासकर उत्तर प्रदेश में अलर्ट है अयोध्या के आसपास भारी संख्या में सुरक्षाबलों को तैनात किया गया है ।

सभी धर्मगुरुओं ने इसी बात पर जोर दिया कि वह देश में अमन और शांति चाहते हैं ।

हो सकता है कि फैसला सबके मन मुताबिक ना रहा हो लेकिन देश सबसे बढ़कर है और देश की शांति सबके लिए अहम है।

बैठक में मौजूद रहे अन्य संतों ने बताया कि मुख्य मुद्दा देश में कैसे अमन शांति कायम रहे यही थी, हम सब इसके लिए प्रयास करेंगे ।

समान नागरिक संहिता की बारी

समान नागरिक संहिता की बारी
समान नागरिक संहिता अथवा समान आचार संहिता का अर्थ एक सेक्युलर धर्म निरपेक्ष कानून जो सभी धर्म के लोगों के लिये समान रूप से लागू होता है । यानि एक देश एक नियम ।

भाजपा की मोदी सरकार इस समय काफी मजबूत दिखाई दे रही है । पहले 370 अब राम मंदिर पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के चलते बीजेपी ने राहत की साँस ली है ।

इससे पहले बीजेपी पर विपक्षी दलों की ओर से राम मंदिर मसले पर राजनीति करने का आरोप लगाया जाता था। विपक्षी नेता अकसर बीजेपी तंज कसते हुए कहते थे, मंदिर वहीं बनाएंगे, पर तारीख नहीं बताएंगे।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का फैसला दिए जाने के बाद बीजेपी ने अब हिंदुत्व के अपने सबसे बड़े मुद्दे राम मंदिर का रास्ता प्रशस्त कर लिया है ।

वह अब अपने समर्थकों के बीच यह कह सकेगी कि उसके 370 और राम मंदिर दोनों ही वादा अगले चुनाव से पहले पूरा कर लिए जाएँगे।

दोनों मुद्दों से अलग अब बीजेपी समर्थक समान नागरिक संहिता की बात भी करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर अब समान नागरिक संहिता की बारी के बारे में पोस्ट वायरल हो रही हैं । ट्विटर और व्हाटसेप पर भी यूनिफॉर्म सिविल कोड टॉप ट्रेंड्स में शामिल हो रहा है ।

डिफेंस मिनिस्टर राजनाथ सिंह से अयोध्या पर आए फैसले की सुनवाई के बाद जब इस पर सवाल पूछा तो उन्होंने  भी इसकी जरूरत बताई। राम मंदिर पर फैसले पर टिप्पणी के बाद पत्रकारों ने जब उनसे कॉमन सिविल कोड पर पूछा तो उन्होंने कहा  ' अब समय आ गया '।

सोशल मीडिया पर फैसले के बाद तेज हुई कॉमल सिविल कोड की चर्चा के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ के आ गया समय भी टॉप ट्रेंड में शामिल है ।

बता दें कि इस मामले की 15 नवंबर को दिल्ली हाई कोर्ट में यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई होनी है। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस सी. हरिशंकर 15 नवंबर को सुनवाई करेंगे।

बंगाल उड़ीसा में बुलबुल तूफान

बंगाल उड़ीसा में बुलबुल तूफान
प्रचंड चक्रवाती तूफान बुलबुल ने पश्चिम बंगाल के तटीय क्षेत्र पर अपनी दस्तक दे दी ।

तूफान बुल बुल ने बंगाल और उड़ीसा के तटीय इलाकों में भारी तबाही मचाई हुई है । तूफान की वजह से अब तक 2 लोगों की मौत की भी खबर है ।

बड़ी संख्या में पेड़ और बिजली के खंभे धराशाई हो गए हैं । जगतपुर और भद्रक में भारी बारिश से तबाही मची हुई है ।

बुलबुल तूफान की वजह से हो रही बारिश के कारण अब तक एक-एक मौत पश्चिम बंगाल और ओडिशा में हुई है ।

मौसम विभाग ने मछुआरों को अगले 12 घंटों के दौरान उत्तर ओडिशा और पश्चिम बंगाल के तटों पर समुद्र में न जाने की सलाह दी गई है।

साथ ही अगले 18 घंटे के लिए बंगाल की उत्तरी खाड़ी में भी न जाने का निर्देश दिया गया है ।

लगभग 100 की रफ्तार से चल रही हैं हवाएँ । होर्डिग बोर्ड और पेड़ों के गिरने से हुए हैं रास्ते बाधित ।

CM ममता वनर्जी पहुँची हैं कंट्रोल रूम । प्रधानमंत्री ने भी ली बुलबुल से हो रहे नुकसान की जानकारी।

 

November 09, 2019

अयोध्या केस ऐतिहासिक फैसला

अयोध्या केस ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने आज 9 नवम्बर 2019 को अयोध्या मामले Ayodhya Verdict में ऐतिहासिक फैसला दिया है ।

कोर्ट ने निम्न वातें अपने फैसले में कहीं --

पांचों जजों की सहमति से फैसला सुनाया गया है ।

शिया वक्फ बोर्ड का दावा विवादित ढांचे को लेकर था जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया।

बाबरी मस्जिद मीर बाकी ने बनवाई थी। बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनी थी। रंजन गोगोई ने कहा कि ASI की रिपोर्ट के मुताबिक खाली जमीन पर मस्जिद नहीं बनी थी ।

अयोध्या में विवादित स्थल के नीचे बनी संरचना इस्लामिक नहीं थी लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यह साबित नहीं किया कि मस्जिद के निर्माण के लिये मंदिर गिराया गया था।

पुरातात्विक साक्ष्यों को सिर्फ एक राय बताना भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रति बहुत ही अन्याय होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राम चबूतरे पर 1855 से पहले हिंदुओं का अधिकार था। अहाते और चबूतरे पर हिंदुओं के अधिकार का सबूत मिला है।

हिंदुओं की यह अविवादित मान्यता है कि भगवान राम का जन्म गिराई गई संरचना में ही हुआ था। 1856-57 से पहले आंतरिक अहाते में हिंदुओ पर कोई रोक नहीं थी, मुसलमानों का बाहरी आहते पर अधिकार नहीं रहा ।

हिन्दू विवादित भूमि को भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं और मुस्लिम भी इस स्थान के बारे में यही कहते हैं। हिन्दुओं की यह आस्था अविवादित है कि भगवान राम का जन्म स्थल ध्वस्त संरचना है।

मुस्लिम पक्ष  अपना मालिकाना हक साबित नहीं कर पाया। हिंदुओं का बाहरी चबूतरे पर अधिकार था।

मुस्लिम पक्ष सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड को अयोध्‍या में मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन उपलब्‍ध कराई जाए।

विवादित जमीन पर ही राम मंदिर बनाया जाएगा।

हक का निर्णय सिर्फ आस्था और विश्वास के आधार पर नहीं किया जा सकता कानूनी अधार पर ही निर्णय लिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सुन्नी वक्फ बोर्ड विवादित ढांचे पर अपना एक्सक्लूसिव राइट साबित नहीं कर पाया ।

कोर्ट ने विवादित ढांचे की जमीन हिंदुओं को देने का फैसला सुनाया, तो मुसलमानों को दूसरी जगह वैकल्पिक जमीन 5 एकड़ देने के लिए कहा है ।

कोर्ट ने साथ ही कहा कि मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार तीन महीने में योजना बनाए, फिलहाल अधिकृत जगह का कब्जा रिसीवर के पास रहेगा ।

November 08, 2019

अयोध्या पर फैसला जानिए कब क्या हुआ

अयोध्या पर फैसला जानिए कब क्या हुआ
सुप्रीम कोर्ट द्वारा संवेदनशील अयोध्या विवाद में 9 नवंबर को सुबह 10:30 पर फैसला सुनायेगा, यह फैसला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई , जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ , जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की 5 सदस्यीय बेंच सुनाएगी ।

इसी बेंच ने 16 अक्ट्रबर को इस मामले की सुनवाई पूरी की थी, 6 अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले में सुनवाई की गई और रंजन गोगई के सेवानिवृत्त होने से पहले फैसला देने की बात कही गई थी ।
अयोध्या विवाद के फैसले के मद्देनज़र उत्तर प्रदेश के सभी शिक्षण संस्थानों को 3 दिन बन्द रखने के आदेश की खबर मिल रही है ।

इस बीच आज शुक्रवार को अयोध्या में सुरक्षा और कड़ी हो गई, राम जन्मभूमि मंदिर की तरफ जाने वाले सारे रास्ते बंद कर दिए गए हैं सीएम योगी आदित्यनाथ ने हर जिले में एक कंट्रोल रूम बनाने और लखनऊ और अयोध्या में दो हेलीकॉप्टर तैयार रखने के आदेश दिए है ।

राम जन्मभूमि मंदिर जाने वाले सारे रास्ते आज गाड़ियों के लिए सील कर दिए गए हैं । इसके साथ पूरे अयोध्या में पुलिस जनता के बीच जाकर उन्हें समझाने और भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही है ।

राम जन्मभूमि , हनुमानगढ़ी, दशरथ महल, कनक भवन, मंदिर निर्माण कार्यशाला राम की पैड़ी आदि पर सुरक्षा कड़ी की गई है ।

जिलाधिकारी अनुज झा ने कहा शादी-ब्‍याह का सीजन है, जैसा तय किया है वैसा ही रहेगा, सारे कार्यक्रम सामन्‍य ढंग से चलते रहेंगे ।

अयोध्या विवाद पर अब तक क्या-क्या हुआ?

1885 में महंत रघुबर दास ने अदालत से मांग की कि बाबरी के पास चबूतरे पर मंदिर बनाने की इजाजत दी जाए किन्तु यह मांग खारिज हो गई ।

1946 में विवाद उठा कि बाबरी मस्जिद शियाओं की है या सुन्नियों की चूँकि बाबर सुन्नी की था इसलिए सुन्नियों की मस्जिद मानी गई ।

1949 में प्रदेश सरकार ने मस्जिद के बाहर राम चबूतरे पर राम मंदिर बनाने की कवायद शुरू की जो नाकाम रही जिसके बाद दिसंबर में मस्जिद में राम सीता और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दी गईं।

29 दिसंबर 1949 को यह संपत्ति कुर्क कर ली और वहां रिसीवर बिठा दिया गया ।

1950 से इस जमीन के लिए अदालती लड़ाई का एक नया दौर शुरू होता है इस तारीखी मुकदमे में जमीन के सारे दावेदार 1950 के बाद के हैं।

गोपाल दास विशारत अदालत गए कहा कि मूर्तियां वहां से न हटें और पूजा बेरोकटोक हो, अदालत ने कहा कि मूर्तियां नहीं हटेंगी, लेकिन ताला बंद रहेगा और पूजा सिर्फ पुजारी करेगा , जनता बाहर से दर्शन करेगी ।

1959 में निर्मोही अखाड़ा अदालत पहुंचा और वहां अपना दावा पेश किया फिर 1961में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने मस्जिद का दावा पेश किया ।

1 फरवरी 1986 को फैजाबाद के जिला जज ने जन्मभूमि का ताला खुलवा के पूजा की इजाजत दे दी, कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बन गई ।

1989 में वीएचपी नेता देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला की तरफ से मंदिर के दावे का मुकदमा किया और मस्जिद से थोड़ी दूर पर राम मंदिर का शिलान्यास किया ।

असली कहानी शुरू हुई 1990 में जब 25 सितंबर 1990 को बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा शुरू की ।

इसकी वजह से गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में दंगे भड़क गए और आडवाणी को 23 अक्टूबर को बिहार में लालू यादव ने गिरफ्तार करवा लिया ।

6 दिसम्बर 1990 को हजारों कारसेवक मस्जिद के गुम्बद पर चढ़ गए और गुम्बद तोड़ डाला और वहां भगवा फहरा दिया इसके बाद भी दंगे भड़क गए।

1991 में यूपी में  बीजेपी की सरकार बन गई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने । 6 दिसंबर 1992 को लाखों कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया । कारसेवक सुबह 11 बजकर 50 मिनट पर मस्जिद के गुम्बद पर चढ़े और शाम 4.30 बजे तक मस्जिद का तीसरा गुम्बद भी गिर गया ।

कल्याण सिंह ने सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए
इस्तीफा दे दिया ।

हाईकोर्ट ने 2003 में झगड़े वाली जगह पर खुदाई करवाई ताकि पता चल सके कि क्या वहां पर कोई राम मंदिर था 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या में विवादित जमीन को राम लला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बराबर बांटने का फैसला किया ।

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सभी पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए तभी से मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है ।
मामले को बीच मे बातचीत से सुलझाने का फैसला किया और इसके लिए तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति का गठन कर दिया । समिति में जस्टिस खलीफुल्ला, श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू शामिल किए गए । पर नतीजा नही आ सका ।

अब कोर्ट की लगातार 40 दिन सुनवाई के बाद नवम्बर में फैसला देना सुनिश्चित किया गया । कल दिनांक 9 नवम्बर 2019 को आने वाले फैसले पर देशभर की नजर रहेगी ।।

इस बीच शोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट , कमेंट आदि करने पर जेल जाना पड़ सकता है अतः शोशल मीडिया का इस्तेमाल ध्यान पूर्वक करें ।

November 04, 2019

प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती
प्रदूषण से एनसीआर में हालत खराब, सुप्रीम कोर्ट नाराज

दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त हिदायत दी है कोर्ट ने कहा है कि पराली जलाने की किसी भी घटना के लिए प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों जबाबदेह होंगे ।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण मामले में पंजाब, हरियाणा और यूपी के मुख्य सचिवों को अपने सामने पेश होने के लिए कहा है ।

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गठित कमेटी EPCA की रिपोर्ट पर सुनवाई में सामने आया कि हरियाणा ने तो पराली जलाने पर काफी हद तक लगाम लगाई है लेकिन पंजाब इस मसले पर गैर जिम्मेदार रहा है ।

कोर्ट ने कहा, "यह परेशान करने वाली बात है कि हर साल 10 से 15 दिनों तक दिल्ली के लोगों का दम घोटा जाता है, पर इस बारे में कोई कुछ नहीं कर रहा है।

पराली जलाने की एक भी घटना अगर होती है तो उसके लिए मुख्य सचिव से लेकर ग्रामपंचायत तक एक एक सरकारी अधिकारी को इसके लिए जिम्मेदार माना जाएगा और उस पर कोर्ट सख्त कार्रवाई करेगा। "

उधर दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण से बुरा हाल है जिसकी वजह से दिल्ली सरकार ने ऑड ईवन योजना शुरु की है सुबह 8 बजे से शाम 8 बजे तक ऑड ईवन का नियम लागू रहेगा।

दिल्ली में ट्रकों के दाखिल होने पर भी रोक लगा दी है, कोर्ट ने दिल्ली सरकार की ऑड इवन पॉलिसी पर भी सवाल उठाए हैं।

सैटेलाइट तस्वीरों से यह साफ हो रहा है कि पंजाब में बड़े पैमाने पर पराली जलाई गई है ।

जस्टिस अरुण मिश्रा और दीपक गुप्ता की बेंच प्रदूषण मामले में टिप्पणी करते हुए कहा, " राज्य सरकारें हमारे निर्देशों के पालन में नाकाम रही हैं, सरकारों का मकसद सिर्फ चुनाव जीतना है? लोगों के जीवन के अधिकार का हनन हो रहा है । घर के अंदर भी हवा शुद्ध नहीं है, लेकिन सरकारों का ध्यान इस तरफ नहीं है ।

कोर्ट ने कहा, "हमें बताया जा रहा है कि खरीफ की फसलों को देर से बोने के चलते, बाद में रबी की फसल लगाने के लिए समय नहीं मिलता इसलिए, किसान फसल के अवशेष जलाते हैं । उनके ऊपर सख्त कार्रवाई की जाए ।

इस काम में ग्राम प्रधानों को भी भागीदार बनाया जाए अगर वह अपने गांव में ऐसी घटना रोकने में असफल रहते हैं, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली एनसीआर में निर्माण कार्य, इमारत गिराना और कूड़ा जलाने पर रोक लगाने का निर्देश दिया, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में भी यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि वहां पराली जलाए जाने की कोई घटना नहीं हो ।

डीजल जनरेटर का इस्तेमाल फिलहाल बंद करने का भी आदेश दिया है ।

कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह हर साल बनने वाले इस स्थिति पर लगाम लगाने के लिए रोडमैप पेश करे, कोर्ट ने इसके लिए 3 हफ्ते दिए हैं ।

एनजीटी ने भी दिल्ली एनसीआर में खराब होती एयर क्वालिटी को संज्ञान में लिया और दिल्ली सरकार, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अधिकारियों से मंगलवार को उसके सामने पेश होने को कहा है ।

November 03, 2019

प्रदूषण न बन जाए मौत

प्रदूषण न बन जाए मौत
बढ़ते प्रदूषण (Pollution) और ग्‍लोबल वार्मिंग का खतरा आजकल आम बात है । लेकिन हम इसको लेकर कितना संजीदा हैं ये सोचने का विषय है । भारत की राजधानी दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण (Pollution) की वजह से आज हर किसी का ध्यान उसी ओर है । लेकिन क्या सिर्फ दिल्ली में ही प्रदूषण फैला हुआ है ? ऐसा कहना बहुत गलत होगा भारत के ही हरियाणा में दिल्ली से अधिक प्रदूषण (Pollution) स्तर नोट किया गया है ।

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में भी प्रदूषण (Pollution) का स्तर कुछ कम नहीं लेकिन ये राजधानी नहीं तो इधर ऐसे शहरों पर कोई सवाल भी नहीं उठाता।

बढ़ते प्रदूषण (Pollution) और ग्‍लोबल वर्मिंग से धरती को बचाने के लिए दुनिया के कई देशों में लोगों ने सरकार पर दबाव बनाने के लिए जन आंदोलन शुरू कर दिए है जिसमें मांग की जा रही है कि सरकार शून्य कार्बन उत्सर्जन के लिए कार्य करे ।

पर्यावरण और उससे जुड़े मसलों पर जैसे जैसे लोग जागरूक हो रहे हैं, उन्हें समझ आ रहा है कि अगर अभी नहीं चेते तो हमारी पीढ़ियों का भविष्य बीमारियों से घिरा होगा। और दुनियाँ में मरने वाला हर दूसरा व्यक्ति प्रदूषण (Pollution) की वजह से मरेगा ।

अगर हम समय रहते नहीं चेते तो हमारे लिए न तो शुद्ध हवा होगी, न स्वच्छ पानी , और न ही स्वच्छ खेती से उपलब्ध खाना। मौसम इतना असंतुलित हो जाएगा कि हम सर्दी गर्मी और बारिश के सीजन भूल जाएँगे और इस बदलते माहौल को हमारा शरीर सह नहीं सकेगा।

कोर्ट से क्‍लाइमेट इमरजेंसी घोषित करने की मांग

भारत में सुप्रीम कोर्ट में जलवायु आपातकाल घोषित करने को लेकर एक याचिका डाली गई है। याचिका में मांग की गई है कि 2025 तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन शून्य स्तर पर लाना सरकार सुनिश्चित करे।

अब तक दुनिया के कई देशों की सरकारें जलवायु आपातकाल को कालू कर चुकी है।

दिसंबर 2016 को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में डेयरबिन शहर में आपातकाल लागू किया गया।

मई 2019 को ब्रिटेन की संसद ने जलवायु आपातकाल घोषित किया।

जून 2019 में वेटिकन सिटी में इमरजेंसी आपातकाल घोषित किया।

आयरलैंड, पुर्तगाल, कनाडा, फ्रांस, अर्जेंटीना, स्पेन, आस्ट्रिया सहित कई देशों ने भी इसे लागू किया है।

भारत की स्थिति और उपाय के कदम

कोयले की खपत (उत्पादन व आयात) करने वाला भारत विश्व का दूसरा बड़ा देश है। वर्ष 2000 के मुकाबले कोयला उत्पादन में तीन गुणा की बढोत्तरी हुई है। भारत में 80 प्रतिशत बिजली उत्पादन भी कोयले से किया जाता है। कोयला आधारित उध्योग को अक्षय उर्जा में परिवर्तित करना होगा तथा ऊर्जा की खपत सरकारी व निजी स्तर पर कैसे कम हो इसके लिए सख्त नियम कायदे बनाने होंगे।

सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि एक परिवार अधिकतम कितना कार्बन उत्सर्जन कर सकता है। इसी आधार पर अपनी नीतियों को अमल में लाना होगा। भारत द्वारा इंटरनेशनल सोलर एलाइंस के गठन में अग्रणी भूमिका निभाना व उस ओर अपने कदमों को मोड़ना भविष्य के लिए एक बेहतर कदम है।

पड़ोसियों से सीखना होगा हमें

भारत को अपने पडोसी चीन से सीख लेने की आवश्यकता है कुछ ही साल पहले चीन की राजधानी बीजिंग की हालात बहुत ही ख़राब थी जहाँ प्रदूषण के कारण दिन में भी सूर्य की रौशनी नजर नहीं आती थी । लेकिन चीन ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए वातावरण को बदलकर रख दिया है  ।वहां हरियाली के प्रबंध करने के साथ साथ सरकार ने एयर प्यूरीफायर बनाए हुए हैं जो हवा का शोधन लगातार करते रहते हैं ।

प्रकृति प्रेम हमें भूटान से भी सीखना चाहिए। यह दुनिया का सबसे हरियाली युक्त देश देश है।  भूटान का क्षेत्रफल केरल प्रदेश के बराबर है। इस देश का 70 फीसद हिस्सा हरियाली से आच्छादित है। करीब तीन चौथाई हिस्सा कार्बन डाईऑक्साइड के सोखने के काम में आता है।

भूटान सकल राष्ट्रीय खुशहाली सूचकांक के आधार पर अपनी नीतियां निर्धारित करते हैं। चार स्तंभों पर खड़े इस सूचकांक में एक स्तंभ पर्यावरण संरक्षण भी है। भूटान अकेला देश है जिसने अपने वनों को बचाने के लिए संवैधानिक प्रावधान कर रखा है। जिसके अनुसार किसी भी समय भूटान के क्षेत्रफल का 60 फीसद हिस्सा वनों से आच्छादित होना चाहिए। देश ने इमारती लकड़ी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है। समस्त बिजली जरूरतें पनबिजली स्रोतों से पूरी होती हैं। ज्यादा बिजली बनाकर यह पड़ोसी देशों को बेचता है

भारत की स्थिति

जलवायु परिवर्तन को लेकर लक्ष्य तय करने के मामले में भारत भी अच्छा कार्य कर रहा है मगर स्तर बढ़ाने की आवश्यकता है । अगर हम वन आच्छादन क्षेत्र बढ़ाने के लक्ष्य को प्राप्त कर लें और कोयला आधारित बिजली प्लांटों का निर्माण बंद कर दें तो हम पर्यावरण में सुधार लाने में कामयाब होंगे।

पेरिस समझौते के अनुसार भारत ने 2005 की तुलना में 2030 तक उत्सर्जन की तीव्रता को 30 से 35 प्रतिशत कम करने की प्रतिबद्धता जताई है। 2030 तक अपनी कुल बिजली क्षमता के 40 प्रतिशत को अक्षय ऊर्जा व परमाणु ऊर्जा में तब्दील करना भी भारत का लक्ष्य है जोकि एक बेहतर कदम है।

हम उन देशों में शामिल हैं जो जलवायु परिवर्तन पर सबसे अधिक गंभीरता से काम कर रहे हैं। भारत औपचारिक रूप से आपातकाल घोषित किए बिना ऐसा कर रहा है।

जलवायु समस्या से जिम्मेदारीपूर्वक निपटने की जरूरत है। किसी व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला कार्बन उत्सर्जन जितना है वह उसका कार्बन फुटप्रिंट कहलाता है। हमें इसमें ही कमी लानी है। आबादी अधिक होने के कारण कार्बन उत्सर्जन में भारत की कुल हिस्सेदारी अधिक है। हमें इसे और कम करने की आवश्यकता है।

 

 

महाराष्ट्र को इतने दिन बाद भी न मिला CM

महाराष्ट्र को इतने दिन बाद भी न मिला CM
महाराष्ट्र में 24 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के इतने दिन बाद भी राज्य में किसकी सरकार बनेगी यह अब तक साफ नहीं हो सका है. शिवसेना 50-50 फॉर्मूले पर अड़ी हुई है तो वहीं बीजेपी इसपर राजी नहीं है. मुख्यमंत्री को लेकर शिवसेना और बीजेपी में जारी खींचतान के बीच एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन को भी महाराष्ट्र में उम्मीदें दिखने लगी हैं.

शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने रविवार को सामना में लिखा कि बीजेपी को ईडी, पुलिस, पैसा, धाक के दम पर अन्य पार्टियों के विधायक तोड़कर सरकार बनानी पड़ेगी. उन्होंने साफ किया कि बीजेपी के सामने शिवसेना घुटने नहीं टेकेगी. शिवसेना ने बीजेपी के राष्ट्रपति शासन वाले बयान पर पलटवार किया गया. सामना में पूछा गया कि राष्ट्रपति आपकी जेब में हैं क्या.

बीजेपी बहुमत से काफी दूर है शिवसेना को ओर से नतीजों के बाद से बीजेपी पर दबाव बनाना जारी है. बीजेपी का मानना है कि वह सबसे बड़ी पार्टी है और वह राज्य में सरकार बना सकती है.

2014 में बीजेपी ने 122 सीट जीतकर एनसीपी के बाहरी समर्थन से सरकारी बना ली थी. हालांकि बाद में शिवसेना सरकार में शामिल हो गई थी. क्या बीजेपी उसी तरह राज्य में सरकार बना सकती है ये देखना है.

शिवसेना की ओर से बीजेपी के खिलाफ बयान से महाराष्ट्र कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को शिवसेना का समर्थन करना चाहिए. जबकि कांग्रेस और शिवसेना अकेले सरकार नहीं बना सकतीं इसके लिए एनसीपी की जरुरत होगी.

लेकिन एनसीपी प्रमुख शरद पवार कह चुके हैं कि उनकी पार्टी को विपक्ष में बैठने के लिए जनता ने चुना और ऐसे में वह विपक्ष में ही बैठेंगे. उधर महाराष्ट्र कांग्रेस के नेताओं की ओर से बयान आया कि अगर शिवसेना हमारे पास समर्थन मांगने आती है तो हम उसपर विचार करेंगे.

सोनिया गांधी और शरद पवार की मुलाकात और शिवसेना के समर्थन मांगे जाने के बाद ही इस राजनीतिक फंडे का असली मुद्दा सामने आएगा .

 

 

November 01, 2019

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