August 28, 2020

वर्ण और वर्णमाला

वर्ण और वर्णमाला

वर्ण और वर्णमाला की परिभाषा-

वर्ण किसे कहते हैं ? varn kise kahte hain

वर्ण की परिभाषा varn ki paribhasha -  

भाषा की सबसे छोटी ध्वनि को वर्ण कहते हैं लिखित ध्वनि संकेतों को देवनागरी लिपि के अनुसार वर्ण कहा जाता हैं वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खंड या टुकड़े नहीं किये जा सकते । जैसे- अ,आ,इ, , , ख्, ग इत्यादि।उदाहरण के लिए : राम  ने आम खाया इस वाक्य के छोटे खंड होंगे राम + ने+ आम + खाया

लेकिन इनसे भी छोटे खंड राम = र+आ+म , ने =  न+ए, आम = आ+म  खाए = ख+आ+ए मूल ध्वनियाँ हैं जिनके आगे खंड नहीं किये जा सकते । इन्हीं अखंड मूल ध्वनियों को वर्ण कहते हैं।

 प्रत्येक भाषा में अनेक वर्ण होते हैं हिन्दी भाषा में 52 वर्ण हैं।

 वर्णमाला किसे कहते हैं ?

वर्णमाला varnmala ki paribhasha - 

किसी भाषा के समस्त वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं।

प्रत्येक भाषा की अपनी अलग वर्णमाला होती है। 
हिंदी- अ, , , , ग..... 
अंग्रेजी- A, B, C, D,....

लिंग की परिभाषा

लिंग की परिभाषा

 

लिंग की परिभाषा Ling ki Paribhasha

लिंग किसे कहते हैं? Ling kise kahte hain ?

लिंग संस्कृत का एक शब्द है जिसका अर्थ निशान होता है जिस संज्ञा शब्द से व्यक्ति की जाति का पता चलता है उसे लिंग कहते हैं। अर्थात संज्ञा का वह रूप जिससे हमें किसी भी व्यक्ति, जीव, या वस्तु आदि की जाति पता चले, वे शब्द लिंग कहलाते हैं। इन शब्दों से यह पता चलता है कि वह पुरुष जाति का है या स्त्री जाती का।

लिंग के उदाहरण

पुरुष जाति में: मोहन, सोहन, मानवपिता, भाई, लड़का, बैल, बकरा, मोर, हाथी, शेर, घोडा, कुत्ता आदि।

स्त्री जाति में:  मीना, महिला, माता, बहन, लड़की, गाय, बकरी, मोरनी, मोहिनी, हथनी, शेरनी, घोड़ी, खिड़की , कुतिया, भैंस, गाय आदि।

लिंग के भेद ling ke prakar

लिंग के मुख्यतः तीन भेद होते हैं :

  1. पुल्लिंग (पुरुष जाति)
  2. स्त्रीलिंग (स्त्री जाति)
  3. नपुंसकलिंग (जड़)

संज्ञा की परिभाषा

 

संज्ञा की परिभाषा (sangya definition in hindi)

संज्ञा किसे कहते हैं – Sangya in Hindi :-

किसी भी व्यक्ति, वस्तु, जाति, भाव या स्थान के नाम को ही संज्ञा कहते हैं। 

 

जैसे:  राम (व्यक्ति), किताब(वस्तु), मानव (जाति), करनाल (स्थान), मिठास(भाव)

संज्ञा के भेद (sangya ke bhed in hindi)

संज्ञा के पांच भेद होते हैं:

  1. व्यक्तिवाचक संज्ञा
  2. भाववाचक संज्ञा
  3. जातिवाचक संज्ञा
  4. द्रव्यवाचक संज्ञा
  5. समूहवाचक या समुदायवाचक संज्ञा




August 25, 2020

काल की परिभाषा, भेद और उदाहरण

काल की परिभाषा, भेद और उदाहरण

Tense In Hindi काल की परिभाषा, भेद और उदाहरण


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काल किसे कहते है kaal kise kahte hain


काल (Tense) की परिभाषा Kaal ki Paribhasha


क्रिया के होने या करने के समय को काल कहते हैं। अथवा क्रिया के जिस रूप से कार्य करने या होने के समय का बोध होता है उसे 'काल' कहते है। अन्य शब्दों में क्रिया के उस रूपान्तर को काल कहते है, जिससे उसके कार्य-व्यापर का समय और उसकी पूर्ण अथवा अपूर्ण अवस्था का बोध हो।

जैसे-
बच्चे पढ़ रहे हैं।
बच्चे पढ़ रहे थे।
बच्चे पढेंगे।

इन वाक्यों की क्रियाओं से कार्य के होने का समय प्रकट हो रहा है।

काल के भेद – Kaal ke Bhed :


काल के तीन भेद होते है-
(1) वर्तमान काल (present Tense) - जो समय चल रहा है।
(2) भूतकाल (Past Tense) - जो समय बीत चुका है।
(3) भविष्यत काल (Future Tense) - जो समय आने वाला है।


  1. वर्तमान काल :–




क्रिया के जिस रुप से यह पता चले कि काम अभी हो रहा है। जिन वाक्यों के अंत में ता , ती , ते , है , हैं आते हैं वो वर्तमान काल कहलाता है। क्रियाओं के होने की निरन्तरता को वर्तमान काल कहते हैं।

वर्तमान काल के भेद :-


(1) सामान्य वर्तमान काल
(2) अपूर्ण वर्तमान काल
(3) पूर्ण वर्तमान काल
(4) संदिग्ध वर्तमान काल
(5) तात्कालिक वर्तमान काल
(6) संभाव्य वर्तमान काल

(1) सामान्य वर्तमान काल :- 


जिस क्रिया से क्रिया के सामान्य रूप का वर्तमान में होने का पता चलता है उसे सामान्य वर्तमान काल कहते हैं। जिन वाक्यों के अंत में ता है , ती है , ते है , ता हूँ , ती हूँ आदि आते हैं उसे सामान्य वर्तमान काल कहते है। जैसे :- सीता पढती है।,  वह आता है।

(2) अपूर्ण वर्तमान काल :-


क्रिया के जिस रूप से कार्य के लगातार होने का पता चलता है उसे अपूर्ण वर्तमान काल कहते है। जिन वाक्यों के अंत में रहा है , रहे है , रही है , रहा हूँ आदि आते है उसे अपूर्ण वर्तमान काल कहते हैं। जैसे :- वह घर जा रहा है।, राम लिख रहा है।

(3) पूर्ण वर्तमान काल :-


क्रिया के जिस रूप से कार्य के अभी पूरे होने का पता चलता है। उसे पूर्ण वर्तमान काल कहते है। जैसे :- मैंने फल खाए हैं।
वह आया है।

(4) संदिग्ध वर्तमान काल :-


क्रिया के जिस रूप से वर्तमान काल क्रिया के होने या करने पर शक हो उसे संदिग्ध वर्तमान काल कहते है। इन वाक्यों के अंत में ता होगा , ती होगी , ते होंगे आदि आते हैं । जैसे :- वह गाता होगा।, गाड़ी आती होगी ।, बच्चा रोता होगा।

(5) तात्कालिक वर्तमान काल :-


क्रिया के जिस रूप से यह पता चलता हो कि कार्य वर्तमान में हो रहा है उसे तात्कालिक वर्तमान काल कहते हैं।

जैसे :- मैं पढ़ रहा हूँ।
वह जा रहा है।

(6) संभाव्य वर्तमान काल :-


संभाव्य का अर्थ होता है संभावित या जिसके होने की संभावना हो। इससे वर्तमान काल में काम के पूरे होने की संभावना होती है उसे संभाव्य वर्तमान काल कहते हैं।

जैसे :- वह चलता हो।
उसने खाया हो।


  1. भूतकाल :–




क्रिया के जिस रूप से यह पता चले कि काम बीते हुए समय में पूरा हो गया है। भूतकाल का अर्थ होता है बीता हुआ। क्रिया के जिस रूप से बीते हुए समय का पता चले उसे भूतकाल कहते हैं। इसकी पहचान वाक्यों के अंत में था , थे , थी आदि से होती है।

इसके छ: भेद है।

i. सामान्य भूत काल :–


क्रिया के जिस रूप से यह मालूम हो कि काम बीते हुए समय में सामान्यतः पूरा हो गया। जिस क्रिया के भूतकाल में क्रिया के सामान्य रूप से बीते समय में पूरा होने का संकेत मिले उसे सामान्य भूतकाल कहते हैं। जिन वाक्यों के अंत में आ , ई , ए , था , थी , थे आते हैं वे सामान्य भूतकाल होता है।

जैसे– वह गया,  पानी गिरा,  वह स्कूल गया।

ii.आसन्न भूत काल:–


क्रिया के जिस रूप से यह ज्ञात हो कि काम अभी-2 पूरा हुआ है। अथार्त क्रिया के जिस रूप से हमें यह पता चले की क्रिया अभी कुछ समय पहले ही पूर्ण हुई है उसे आसन्न भूतकाल कहते हैं।

जैसे – वह अभी गया, मैं अभी सोकर उठा हूँ,  उसने दवा खायी है।

iii. पूर्ण भूत काल:–


क्रिया के जिस रुप से यह ज्ञात हो कि काम बहुत पहले पूरा हो चुका था। अथार्त क्रिया के जिस रूप से यह पता चले की कार्य को समाप्त हुए बहुत समय बीत चूका है उसे पूर्ण भूतकाल कहते हैं।

जैसे – वह गया था, बच्चा आया था, उसने विजय को मारा था।

iv. अपूर्ण भूत :–


क्रिया के जिस रुप से क्रिया का भूतकाल में होना पाया जाए, लेकिन पूर्ण हुआ या नहीं ज्ञात न हो, उसे अपूर्ण भूत कहते है। अथार्त क्रिया के जिस रूप से कार्य के भूतकाल में शुरू होने का पता चले लेकिन खत्म होने का पता न चले उसे अपूर्ण भूतकाल कहते हैं।

जैसे – वह जा रहा था, सुनील पढ़ रहा था,  बच्चे खेल रहे थे।

v. संदिग्ध भूत :–


जिस क्रिया के करने या होने में संदेह हो उसे संदिग्ध भूत कहते है। क्रिया के जिस रूप से कार्य के भूतकाल में पूरा होने पर संदेह हो कि वह पूरा हुआ था या नहीं उसे संदिग्ध भूतकाल कहते हैं।

जैसे– वह गया होगा, उसने खाया होगा, महिमा चली गई होगी।

vi. हेतु हेतुमद भूत :–


क्रिया के जिस रुप से कार्य के भूतकाल में होने या किए जाने की शर्त पाई जाए, उसे हेतुहेतुमद भूत कहते है। इसमें पहली क्रिया दूसरी क्रिया पर निर्भर होती है। पहली क्रिया तो पूरी नहीं होती लेकिन दूसरी भी पूरी नहीं हो पाती।

जैसे – वह मेहनत करता तो सफल हो जाता।
यदि वर्षा होती तो फसल अच्छी होती।


  1. भविष्य काल :–




क्रिया के जिस रुप से किसी काम का आने वाले समय में किया जाना या होना ज्ञात हो उसे भविष्य काल कहते है। जिन वाक्यों के अंत में गा , गे , गी आदि आते हैं वे भविष्य काल होते हैं।

भविष्य काल के भेद :-

(1) सामान्य भविष्य काल
(2) संभाव्य भविष्य काल
(3) हेतुहेतुमद्भविष्य भविष्य काल

i. सामान्य भविष्य :–


क्रिया के जिस रूप से काम का सामान्य रूप से भविष्य में किया जाना या होना पाया जाए अर्थातजिन शब्दों के अंत में ए गा , ए गी , ए गे आदि आते हैं उन्हें सामान्य भविष्य काल कहते हैं।

जैसे- माता जी तीर्थ यात्रा पर जाएगी , वह घर जायेगा,  राम आएगा,  मै प्रातः कॉलेज जाऊँगा।

ii. सम्भाव्य भविष्य :–


क्रिया का वह रूप जिससे काम के भविष्य में होने या किए जाने की सम्भावना है, पर निश्चितनहीं, उसे सम्भाव्य भविष्य कहते है।

जैसे– शायद कल सवेरे वह आ जाए , वह विजयी होगा।
शायद आज रात वर्षा हो।

iii. हेतुहेतुमद्भविष्य भविष्य काल:-


क्रिया के जिस रूप से एक कार्य का पूरा होना दूसरी आने वाले समय की क्रिया पर निर्भर हो उसे हेतुहेतुमद्भविष्य भविष्य काल कहते है। इसमें एक क्रिया दूसरी पर निर्भर होती है। इसमें एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर होता है।

जैसे :- वह आये तो मैं जाऊ।
वह पढ़ेगा तो सफल होगा।

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August 23, 2020

व्याकरण की परिभाषा Defination Of Hindi Grammar

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व्याकरण की परिभाषा


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Defination Of Grammar
व्याकरण-


व्याकरण वह विध्या है जिसके द्वारा हमे किसी भाषा का शुद्ध बोलना, लिखना एवं समझना आता है। भाषा की संरचना के कुछ नियम होते हैं और भाषा की अभिव्यक्तियाँ असीमित। भाषा के इन नियमों को एक साथ जिस शास्त्र के अंतर्गत अध्ययन किया जाता है उस शास्त्र को व्याकरण कहते हैं।

किसी भाषा के ज्ञान की कमी के कारण कुछ लोग शब्दों के उच्चारण करने अथवा अर्थ समझने में गलती करते हैं। इसीलिए भाषा की शुद्धता और एकरूपता बनाए रखने का कार्य व्याकरण से होता है। भाषा के गूढ़ ज्ञानियों द्वारा रचा व्याकरण भाषा के नियमों का एक संग्रह है ।

उदाहरण से समझें -
शंकर स्कूल गई थी सीता भी जाएगा।
इस वाक्य में अशुद्धि क्योंकि शंकर पुल्लिंग है और सीता स्त्रीलिंग ।

सही वाक्य शंकर स्कूल गया था सीता भी जाएगी होगा

व्याकरण के प्रकार


भाषा के चार मुख्य अंग हैं-  वर्ण, शब्द पद और वाक्य। इसलिए व्याकरण के मुख्यतः चार प्रकार हैं-

(1) वर्ण या अक्षर 
(2) शब्द 
(3) पद

(4)वाक्य

 

(1) वर्ण या अक्षर:- भाषा की सबसे छोटी ध्वनि को वर्ण कहते है जिसके टुकड़े नही किये जा सकते है।
जैसे- अ, ब,स, द, आदि।

(2) शब्द:- वर्णो के उस समूह को शब्द कहते है जिसका कुछ अर्थ होता है। जैसे- आगरा,रमेश, पानी, आदि।

इसमें शब्द-रचना, उनके भेद, तथा उनके प्रयोग आदि पर विचार किया जाता है।

(3) पद-  इसमें पद-भेद, पद-रूपान्तर तथा उनके प्रयोग आदि को समझा जाता है।

 (4 )वाक्य :- अनेक शब्दों को मिलाकर वाक्य बनता है। ये शब्द मिलकर किसी अर्थ का ज्ञान कराते है।
जैसे- राम खाना खाता है। इनमें वाक्य व उसके अंग, पदबंध तथा विराम चिह्न आदि पर विचार किया जाता है।

हिन्दी व्याकरण की विशेषताएँ

हिन्दी-व्याकरण संस्कृत व्याकरण पर आधारित है ।लेकिन इसकी भी खुद की कई विशेषता हैं हिन्दी व्याकरण प्रायः संस्कृत व्याकरण के आधार पर ही बनाया है पर कहीं कहीं अंतर भी है।

ध्वनि और लिपि

ध्वनि-  ध्वनियाँ हर प्राणी निकालता है और ये अन्य से भिन्न होती हैं । ध्वनि निर्जीव वस्तुओं की भी होती है जैसे- कम्पन आदि। व्याकरण में केवल मनुष्य के मुँह से निकली ध्वनियों पर विचार किया जाता है।

बोली शब्दों से बनती है और शब्द ध्वनियों के संयोग से। आरम्भ में ध्वनियो को लिखने के लिए चिह्नों से काम लिया गया और क्रमशः शब्दचिह्न और ध्वनिचिह्न बनने के बाद लिपियों का निर्माण हुआ। चिह्नों में परिवर्तन होते रहे। वर्तमान लिपियाँ चिह्नों के अन्तिम रूप हैं। हिन्दी भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती।

लिपि - विचारो को विशेष प्रकार के चिन्हों से लिखना ही लिपि कहलाता है। हिंदी और संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है। अंग्रेजी भाषा की लिपि रोमन पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी और उर्दू भाषा की लिपि फारसी है।

हिन्दी में लिपि चिह्न

देवनागरी के वर्णो में ग्यारह स्वर और इकतालीस व्यंजन हैं। व्यंजन के साथ स्वर का संयोग होने पर स्वर का जो रूप होता है, उसे मात्रा कहते हैं जैसे : क का कि की कु कू के कै को कौ

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