August 29, 2020

Sukanya Samraddhi Yojna in hindi

 

क्या है सुकन्या समृद्धि योजना? (SSY) Sukanya Samraddhi Yojna in Hindi

सुकन्‍या समृद्धि भारत सरकार द्वारा लाई गई एक बचत योजना है जिसके अंतर्गत अभिभावक कन्या के नाम से खाता खोल सकते हैं | यह खाता केवल जन्म से लेकर 10 वर्ष की उम्र की लड़की के नाम पर ही खुलवाया जा सकता है । यह खाता किसी भी डाकखाने और निर्धारित सरकारी बैंकों में खोला जा सकता है।

केंद्र सरकार द्वारा यह बचत योजना बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ स्कीम के तहत लांच किया गया है। इस बचत स्कीम में सबसे बेहतर ब्याज दर देने का प्रावधान है ।

10 साल से कम उम्र की बच्ची के लिए उच्च शिक्षा और शादी के लिए बचत करने के लिहाज से केंद्र सरकार की सुकन्या समृद्धि योजना एक अच्छी निवेश योजना है।

इस योजना में निवेश से आपको इनकम टैक्स बचाने में भी मदद मिलती है क्योंकि इस में जमा की जाने वाली रकम और परिपक्‍व रकम को आयकर अधिनियम की धारा 80सी के तहत पूरे कर छूट प्राप्‍त है।




August 28, 2020

वर्ण और वर्णमाला

वर्ण और वर्णमाला

वर्ण और वर्णमाला की परिभाषा-

वर्ण किसे कहते हैं ? varn kise kahte hain

वर्ण की परिभाषा varn ki paribhasha -  

भाषा की सबसे छोटी ध्वनि को वर्ण कहते हैं लिखित ध्वनि संकेतों को देवनागरी लिपि के अनुसार वर्ण कहा जाता हैं वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खंड या टुकड़े नहीं किये जा सकते । जैसे- अ,आ,इ, , , ख्, ग इत्यादि।उदाहरण के लिए : राम  ने आम खाया इस वाक्य के छोटे खंड होंगे राम + ने+ आम + खाया

लेकिन इनसे भी छोटे खंड राम = र+आ+म , ने =  न+ए, आम = आ+म  खाए = ख+आ+ए मूल ध्वनियाँ हैं जिनके आगे खंड नहीं किये जा सकते । इन्हीं अखंड मूल ध्वनियों को वर्ण कहते हैं।

 प्रत्येक भाषा में अनेक वर्ण होते हैं हिन्दी भाषा में 52 वर्ण हैं।

 वर्णमाला किसे कहते हैं ?

वर्णमाला varnmala ki paribhasha - 

किसी भाषा के समस्त वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं।

प्रत्येक भाषा की अपनी अलग वर्णमाला होती है। 
हिंदी- अ, , , , ग..... 
अंग्रेजी- A, B, C, D,....

लिंग की परिभाषा

लिंग की परिभाषा

 

लिंग की परिभाषा Ling ki Paribhasha

लिंग किसे कहते हैं? Ling kise kahte hain ?

लिंग संस्कृत का एक शब्द है जिसका अर्थ निशान होता है जिस संज्ञा शब्द से व्यक्ति की जाति का पता चलता है उसे लिंग कहते हैं। अर्थात संज्ञा का वह रूप जिससे हमें किसी भी व्यक्ति, जीव, या वस्तु आदि की जाति पता चले, वे शब्द लिंग कहलाते हैं। इन शब्दों से यह पता चलता है कि वह पुरुष जाति का है या स्त्री जाती का।

लिंग के उदाहरण

पुरुष जाति में: मोहन, सोहन, मानवपिता, भाई, लड़का, बैल, बकरा, मोर, हाथी, शेर, घोडा, कुत्ता आदि।

स्त्री जाति में:  मीना, महिला, माता, बहन, लड़की, गाय, बकरी, मोरनी, मोहिनी, हथनी, शेरनी, घोड़ी, खिड़की , कुतिया, भैंस, गाय आदि।

लिंग के भेद ling ke prakar

लिंग के मुख्यतः तीन भेद होते हैं :

  1. पुल्लिंग (पुरुष जाति)
  2. स्त्रीलिंग (स्त्री जाति)
  3. नपुंसकलिंग (जड़)

संज्ञा की परिभाषा

 

संज्ञा की परिभाषा (sangya definition in hindi)

संज्ञा किसे कहते हैं – Sangya in Hindi :-

किसी भी व्यक्ति, वस्तु, जाति, भाव या स्थान के नाम को ही संज्ञा कहते हैं। 

 

जैसे:  राम (व्यक्ति), किताब(वस्तु), मानव (जाति), करनाल (स्थान), मिठास(भाव)

संज्ञा के भेद (sangya ke bhed in hindi)

संज्ञा के पांच भेद होते हैं:

  1. व्यक्तिवाचक संज्ञा
  2. भाववाचक संज्ञा
  3. जातिवाचक संज्ञा
  4. द्रव्यवाचक संज्ञा
  5. समूहवाचक या समुदायवाचक संज्ञा




August 27, 2020

National Sports Day

National Sports Day

National Sports Day - India

National Sports Day is celebrated in various countries to honour the national sports teams and sports traditions of those countries.On this day people from different age groups take part in sports like kabaddi,  basketball, hockey etc.

The National Sports Day is celebrated on 29 August in india on the birth anniversary of hockey legend Major Dhyan Chand, who is regarded as nation's greatest hockey player of all time.

The National Sports Day is observed every year to spread awareness about the importance of sports and games in the life of every individual.

Major Dhyan Chand (29 August 1905 – 3 December 1979) was an Indian hockey player and the greatest hockey player in the history of the sport. 

Bachpan ki yaden 2

 क्या आपके सामने ये सब हुआ है ?


आप सोचकर देखिए वो पुरानी यादें , मन प्रफुल्लित हो उठेगा , एक रोमांच सा जेहन में उतर आएगा । खुद ही सोचेंगे ऐसा भी हुआ था कभी , बच्चों को बताओगे तो उन्हें यकीन न आएगा ।

 कम ही घरों में टीवी हुआ करती थी , टीवी वो भी ब्लैक एंड व्हाइट , दूरदर्शन के प्रसारण को देखने के लिए एंटीना एडजस्ट करना होता था , घर की छत पर एंटीना सही करने वाला एक, दूसरा बाहर खड़ा होकर निर्देश देने वाला और तीसरा टीवी पर चित्र साफ हुए या नहीं देखने वाला , आवाज छत से "आई क्या" , "अरे नहीं थोड़ा और घुमा " , "आई आई अरे पहले वाली साइड में ले थोड़ा , हाँ आ गई ", यहीं फिक्स करके उतर आ ।

सन सतासी दूरदर्शन पर रामायण का प्रसारण पूरे गांव में एक टीवी , बिजली तो कहीं कहीं थी तो टीवी बैटरी से चलती थी , बैटरी के चार्ज होने की फिक्र बैटरी वाले से ज्यादा सारे गाँव वालों को हुआ करती थी ।

याद है मामा जी का वो गाँव जहाँ ट्रैक्टर के बोनट पर रखकर उसकी बैटरी से टीवी पर रामायण का चलना और ट्रैक्टर के सामने पूरे गाँव की भीड़ एक टक निगाह टीवी पर ।
 जिस दिन ट्रैक्टर खेत से आधा घंटे पहले ना पहुंचा तो सबको फिकर कहीं रामायण ना निकल जाए , बुलाने के लिए साइकिल सवार खेतों की दौड़ लगाते जुताई रुकवाकर ट्रैक्टर का वापस आना और सबका खुशी से चिल्लाना "आ गया आ गया "।

यही हालात रामायण के बाद दूरदर्शन पर रिलीज हुए दूसरे धारावाहिक महाभारत के साथ हुए । आज जब आप सोच भी नहीं सकते कि सिर्फ टीवी देखने दूसरे के घर जाना , उस समय लोग बुला लिया करते थे अरे मेरे पास व्यवस्था है आ जाना और साथियों को भी लेते आना , फॉर्मेलिटी तो जैसे थी ही नहीं कहीं , पैसा कम था पर दिल बहुत बड़े ।

समय बदला हालात बदल गए घर घर घर टीवी आ गईं , बिजली का दायरा बढ़ने लगा घरों में टीवी के साथ पंखे भी आ गए ।
 वो दौर भी आया जब चन्द्रकान्ता, और शक्तिमान जैसे धारावाहिकों ने खूब लुभाया। रविवार को सुबह जल्दी तैयार होकर सीधा टीवी के सामने सुबह 7 बजे रंगोली के मधुर गानों।से शुरुआत करके धारावाहिक और कार्टून आदि लगभग 12 बजे तक और उसके बाद साप्ताहिक फ़िल्म शाम के समय , फिर से संडे का इंतजार ।

 बीच बीच में कई जासूसी धारावाहिक जैसे एक दो तीन चार, सुपर सिक्स, व्योमकेश बख्शी, और तहकीकात का क्रेज बस देखने लायक होता था , तब बिजली जाने पर जिनके घरों में बैटरी होती थीं वहाँ की तरफ निकल आते थे बच्चे ।

पुराने लोगों को याद होगा गर्मियों में छत पर सोने के लिए पहले से दो बाल्टी पानी डालकर आना जिससे छत थोड़ा ठंडी हो जाए , और अपनी अपनी जगह निश्चित कर लेना कि कौन कहाँ सोएगा , बच्चे बच्चे एक साइड बड़े बड़े एक साइड , छत से मिली छत , अड़ोसी पड़ोसी से गप शप के बाद सुकून भरी नींद ।

Bachpan ki yaaden 1

 कुछ धुंधला धुंधला सा याद है सब कुछ जो गुजर गया । याद हैं कुछ मीठी मीठी सी बातें और कुछ कड़वे से पल जो भूल जाना ही बेहतर है । यादें तो अच्छी संजोना ही अच्छा लगता है ।

जिए हैं हमने वो लम्हे जो आने वाले भविष्य में लोग शायद ना ही जी पाएँगे , देखें हैं वो माहौल जो उनको नसीब न हो पाएँगे ।
जी हाँ हम अस्सी के दशक में जन्मे और गाँव से जुड़े कस्बो और शहर में रहने वाले वे लोग जिन्होंने हर तरह की जिंदगी को करीब से देखा है । देखी हैं वो खुशिया वो माहौल वो प्यार वो दुलार जो आज के रिश्तों में दिखाई ही नहीं देता ।

वो दिन भी क्या दिन थे साहब पैसा कम था खुशियाँ ज्यादा , गाँव में बिजली तो नहीं थी मगर सुकून बड़ा था , परेशानियां बहुत थीं मगर इंसान आज से ज्यादा सुखी था ।

आज भी याद है वो बचपन जब गर्मी की छुट्टियों का इंतजार सभी बच्चों को होता था , जाना होता था अपने गांव या नानी के घर । और ये इंतजार हमें ही नहीं उनको भी होता था जिनके पास हम जाने वाले होते थे । और छुट्टियां खत्म होते होते फिर से आपस में सभी कजिन के वादे अगली छुट्टियों में फिर से यहीं मिलेंगे । फोन तो थे नहीं तब तो पहले ही मिलने की प्लानिंग हो जातीं थीं और घर वाले कहीं भी जाएं मगर हमें वहीं जाने दें जहां हमें मजा आता है जिद मतलब जिद ।

आज हालात कुछ ऐसे हैं कि 1 घण्टे बिजली ना आए तो तुरंत परेशानी होने लगती है इन्वर्टर है मगर बिजली आने का इंतजार है बच्चों को बिना ऐसी नींद नहीं आती और बच्चे गाँव जाना पसंद ही नहीं करते , उनका तो चलता है बस कार्टून , कैरम, लूडो वो भी लिमिटेड पेरेंट्स खेलने दें तब ना । सभी पैरेंट्स को बच्चा क्लास में पहले नंबर पर चाहिए ।

एक समय था , कक्षा में पास होना होता था मतलब पास बस  , न तो मोटी मोटी किताब कॉपी थीं न इतना भारी बस्ता , माँ बाप की अभिलाषा जरूर होती थी कि हमारा बच्चा पढ़े मगर ऐसी जिद न होती थी कि मार्क्स कितने आएं ।

Bachpan ki yaaden 4

 क्या आपने बचपन में तीन पहिए वाली लकड़ी की गाड़ी पकड़कर चलना सीखा या किसी बच्चे को चलते देखा है ?




तब वॉकर नहीं थे साहब चलना सीखने को बच्चों को वो तीन पहिए की गाड़ी फेमस थी , जो आजकल भी कहीं कहीं बिकती तो है पर लेने वाले नहीं मिलते ।

 जो पालना आप बाजार से खरीदकर बच्चों को झुलाते हो , क्या आपने कभी देखा है गांव में एक छोटी चारपाई जिसे खटोला कहते हैं उसके चार पाए को रस्सी से बांधकर उसी को पालना बनाकर माँ अपने बच्चे को रस्सी से झुलाती हुई ।


वो साइकिल के पहिए से निकले खराब टायर को छोटी सी लकड़ी का टुकड़ा लेकर दौड़ाना , और देखना चल किसकी गाड़ी आगे निकलती है ।

एक खेल था शायद बहुतों ने नाम भी न सुना हो 'हुर का दंड' ये खेल सिर्फ और सिर्फ गाँव में ही खेला जाने वाला खेल था जो विलुप्त से हो गया , क्योंकि इसे खेला जाता था जहाँ पेड़ अधिक हों , एक बच्चा एक लकड़ी ( दंड) को अपनी टाँगों के नीचे से फेंकता था और उस सहित बाकी सभी आसपास के पेड़ों पर चढ़ जाते थे , जिस पर दांव होता था उसे किसी भी एक बच्चे को छूना होता था पर शर्त ये थी कि उसे उस फेंकी हुई लकड़ी की हिफाजत भी करनी होती थी यानी वो किसी एक को छूने गया दूसरे ने पेड़ से उतर कर लकड़ी ले ली तो फिर से दांव उसी पर और लकड़ी तक किसी के पहुँचने में वो छू लिया तो दांव दूसरे पर ।


हालांकि अन्य भी कई खेल धीरे धीरे विलुप्ति की कगार पर हैं जैसे कंचा गोली , गुल्ली डंडा, छान छान चलनी आदि

चोर सिपाही और सामूहिक रस्सी कूद व लँगड़ी टांग भी अब लगभग खत्म से हैं ।


सावन के महीने में किसी भी गाँव मे जाते थे तो शायद ही किसी पेड़ की मजबूत डाली होती थी जिस पर झूला न पड़ा हो । क्या छोटे बच्चे, बच्ची और क्या उस गाँव की बड़ी बेटियां जो सावन में मायके आई हुई होती थीं मिलकर झूले का लुत्फ उठाते थे , साथ साथ गाने भी गाए जाते थे एक गाना तो बड़ा फेमस था ''झूला तो पड़ गए , अमुआ की डाल पे जी" ।

आज के समय में कहीं भी जाओ झूले तो शायद मिल जाएं एक दो जगह पर वो आपसी तालमेल वो हँसी ठिठोली वो मस्ती अब वो बात नहीं ।