October 24, 2020

करवाचौथ KARWA CHAUTH

करवाचौथ KARWA CHAUTH
इस बार करवा चौथ KARWA CHAUTH 4 नवम्बर 2020 दिन बुद्धवार को है ।

दरअसल करवा चौथ (Karva Chauth) का त्‍योहार दीपावली (Diwali) से नौ दिन पहले कार्तिक मास की चतुर्थी को मनाया जाता है ।

करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए पूरे दिन भूखे-प्यासे रहकर व्रत रखती हैं। इस दिन पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद करवा चौथ की कथा शाम को सुनी जाती है।

फिर रात को चांद को अर्घ्य देने के बाद व्रत संपन्न होता है। छलनी में पति का मुंह देखकर उसके हाथ से पानी पीकर व कुछ खाकर व्रत पूरा माना जाता है ।

जिन महिलाओं के पति बाहर होते हैं वे आजकल फोन से बात करके व्रत तोड़ती हैं ।

महिलाएं हफ्तों पहले से व्रत की तैयारियां शुरू कर देती हैं बाजार से शॉपिंग , मेंहदी और पूरा मेकअप कर साज श्रृंगार के साथ बिल्कुल नई दुल्हन नजर आती हैं।

करवाचौथ :


भारतीय सुहागिनों का एक ऐसा व्रत जो पति की लंबी आयु के लिए रखा जाता है , आस्था और भावनाओं की एक बहुत बड़ी मिसाल है करवाचौथ ।

करवाचौथ कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है।

यह पर्व सुहागिन स्त्रियां मनाती हैं किंतु नए चलन में देखा जा रहा है कि शादी तय होने पर कुछ लड़कियां भी ये व्रत करने लगी हैं तथा नए पीढ़ी के पुरुष वर्ग भी अपनी पत्नियों का साथ देने व्रत करते देखे जाते हैं ।

यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले शुरू होकर रात में चंद्रमा दर्शन के बाद संपूर्ण होता है।

अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं।

करवाचौथ की प्रचलित कहानी :-


बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे।

एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई थी। भाई जब घर आए तो देखा करवा बहुत व्याकुल थी। उसने बताया कि उसका आज करवाचौथ का निर्जल व्रत है।

वह चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर ही भोजन कर सकती है। चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।

सबसे छोटे भाई को बहन की हालत देखी नहीं गई और वह दूर वरगद के पेड़ पर दीपक जलाकर छलनी की ओट में रख देता है।
यह दीपक दूर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे चांद निकल आया हो । वह बहन को बताता है कि चांद निकल आया है।

करवा चांद को देखती है, अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है। वह पहला टुकड़ा वह जैसे ही मुंह में डालती है तो उसे छींक आ जाती है। दूसरे टुकड़े में बाल निकल आता है। जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश करती है तो उसके पति की मृत्यु का समाचार मिलता है।

उसकी भाभी उसे सच्चाई बताती हैं कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवाचौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं।

करवा निश्चय करती है कि पति का अंतिम संस्कार नहीं होने देगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाएगी। वह पूरे साल पति के शव के पास बैठी रहती है। एक साल बाद फिर चौथ का व्रत आया तो करवा की भाभियां उससे मिलने आईं।

ननद की दशा देखकर वे सभी बहुत दुखी हुईं और उससे कहा कि तुम्हारा सुहाग चौथ माता ने लिया है वही तुम्हें सुहाग देंगी। आज चौथ का व्रत है और सभी के घरों में चौथ माता आएंगी। जब माता आएं तो तुम उनके पांव पकड़ लेना। उनसे क्षमा याचना करना।

जब चौथ माता आईं तो करवा ने उनके पांव पकड़ लिए। अपने सुहाग को जीवित करने की याचना करने लगी। चौथ माता को दया आ गई और उन्होंने अपनी छोटी अंगुली को चीरकर उसमें से निकला अमृत उसके पति के मुंह में डाल दिया।

करवा का पति तुरंत श्रीगणेश कहता हुआ उठ बैठता है। इस प्रकार चौथ माता के आशीर्वाद से करवा को अपना सुहाग वापस मिल जाता है।



 

दीपावली Deepawali (दिवाली Diwali)

गोवर्धन पूजा Goverdhan Pooja

नरक चतुर्दशी (छोटी दिवाली) Narak Chaturdashi

छठ पूजा Chhath Pooja

धनतेरस Dhanteras

करवाचौथ Karavachauth

नवरात्रि NavRatri

 

 

 

October 08, 2019

हनुमान चालीसा

हनुमान चालीसा

हनुमान चालीसा अर्थ सहित !


श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि।

बरनऊँ रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।

 

《अर्थ》→ गुरु महाराज के चरण.कमलों की धूलि से अपने मन रुपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो चारों फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला हे।

 

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरो पवन कुमार।

बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।

 

《अर्थ》→ हे पवन कुमार! मैं आपको सुमिरन.करता हूँ। आप तो जानते ही हैं, कि मेरा शरीर और बुद्धि निर्बल है। मुझे शारीरिक बल, सदबुद्धि एवं ज्ञान दीजिए और मेरे दुःखों व दोषों का नाश कर दीजिए।

 

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥1॥

 

《अर्थ 》→ श्री हनुमान जी! आपकी जय हो। आपका ज्ञान और गुण अथाह है। हे कपीश्वर! आपकी जय हो! तीनों लोकों,स्वर्ग लोक, भूलोक और पाताल लोक में आपकी कीर्ति है।

 

राम दूत अतुलित बलधामा, अंजनी पुत्र पवन सुत नामा॥2॥

《अर्थ》→ हे पवनसुत अंजनी नंदन! आपके समान दूसरा बलवान नही है।

 

महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी॥3॥

《अर्थ》→ हे महावीर बजरंग बली! आप विशेष पराक्रम वाले है। आप खराब बुद्धि को दूर करते है, और अच्छी बुद्धि वालो के साथी, सहायक है।

 

कंचन बरन बिराज सुबेसा, कानन कुण्डल कुंचित केसा॥4॥

《अर्थ》→ आप सुनहले रंग, सुन्दर वस्त्रों, कानों में कुण्डल और घुंघराले बालों से सुशोभित हैं।

 

हाथ ब्रज और ध्वजा विराजे, काँधे मूँज जनेऊ साजै॥5॥

《अर्थ》→ आपके हाथ मे बज्र और ध्वजा है और कन्धे पर मूंज के जनेऊ की शोभा है।

 

शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन॥6॥

《अर्थ 》→ हे शंकर के अवतार! हे केसरी नंदन! आपके पराक्रम और महान यश की संसार भर मे वन्दना होती है।

 

विद्यावान गुणी अति चातुर, राम काज करिबे को आतुर॥7॥

《अर्थ 》→ आप प्रकान्ड विद्या निधान है, गुणवान और अत्यन्त कार्य कुशल होकर श्री राम काज करने के लिए आतुर रहते है।

 

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया, राम लखन सीता मन बसिया॥8॥

《अर्थ 》→ आप श्री राम चरित सुनने मे आनन्द रस लेते है। श्री राम, सीता और लखन आपके हृदय मे बसे रहते है।

 

सूक्ष्म रुप धरि सियहिं दिखावा, बिकट रुप धरि लंक जरावा॥9॥

《अर्थ》→ आपने अपना बहुत छोटा रुप धारण करके सीता जी को दिखलाया और भयंकर रूप करके.लंका को जलाया।

 

भीम रुप धरि असुर संहारे, रामचन्द्र के काज संवारे॥10॥

《अर्थ 》→ आपने विकराल रुप धारण करके.राक्षसों को मारा और श्री रामचन्द्र जी के उदेश्यों को सफल कराया।

 

लाय सजीवन लखन जियाये, श्री रघुवीर हरषि उर लाये॥11॥

《अर्थ 》→ आपने संजीवनी बुटी लाकर लक्ष्मणजी को जिलाया जिससे श्री रघुवीर ने हर्षित होकर आपको हृदय से लगा लिया।

 

रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई, तुम मम प्रिय भरत सम भाई॥12॥

《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा की तुम मेरे भरत जैसे प्यारे भाई हो।

 

सहस बदन तुम्हरो जस गावैं, अस कहि श्री पति कंठ लगावैं॥13॥

《अर्थ 》→ श्री राम ने आपको यह कहकर हृदय से.लगा लिया की तुम्हारा यश हजार मुख से सराहनीय है।

 

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा, नारद,सारद सहित अहीसा॥14॥

《अर्थ》→श्री सनक, श्री सनातन, श्री सनन्दन, श्री सनत्कुमार आदि मुनि ब्रह्मा आदि देवता नारद जी, सरस्वती जी, शेषनाग जी सब आपका गुण गान करते है।

 

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते, कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥15॥

《अर्थ 》→ यमराज,कुबेर आदि सब दिशाओं के रक्षक, कवि विद्वान, पंडित या कोई भी आपके यश का पूर्णतः वर्णन नहीं कर सकते।

 

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा, राम मिलाय राजपद दीन्हा॥16॥

《अर्थ 》→ आपनें सुग्रीव जी को श्रीराम से मिलाकर उपकार किया, जिसके कारण वे राजा बने।

 

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना, लंकेस्वर भए सब जग जाना ॥17॥

《अर्थ 》→ आपके उपदेश का विभिषण जी ने पालन किया जिससे वे लंका के राजा बने, इसको सब संसार जानता है।

 

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥18॥

《अर्थ 》→ जो सूर्य इतने योजन दूरी पर है की उस पर पहुँचने के लिए हजार युग लगे। दो हजार योजन की दूरी पर स्थित सूर्य को आपने एक मीठा फल समझ कर निगल लिया।

 

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहि, जलधि लांघि गये अचरज नाहीं॥19॥

《अर्थ 》→ आपने श्री रामचन्द्र जी की अंगूठी मुँह मे रखकर समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नही है।

 

दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥20॥

《अर्थ 》→ संसार मे जितने भी कठिन से कठिन काम हो, वो आपकी कृपा से सहज हो जाते है।

 

राम दुआरे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥21॥

《अर्थ 》→ श्री रामचन्द्र जी के द्वार के आप.रखवाले है, जिसमे आपकी आज्ञा बिना किसी को प्रवेश नही मिलता अर्थात आपकी प्रसन्नता के बिना राम कृपा दुर्लभ है।

 

सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू.को डरना॥22॥

《अर्थ 》→ जो भी आपकी शरण मे आते है, उस सभी को आन्नद प्राप्त होता है, और जब आप रक्षक. है, तो फिर किसी का डर नही रहता।

 

आपन तेज सम्हारो आपै, तीनों लोक हाँक ते काँपै॥23॥

《अर्थ. 》→ आपके सिवाय आपके वेग को कोई नही रोक सकता, आपकी गर्जना से तीनों लोक काँप जाते है।

 

भूत पिशाच निकट नहिं आवै, महावीर जब नाम सुनावै॥24॥

《अर्थ 》→ जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम सुनाया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच पास भी नही फटक सकते।

 

नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत बीरा॥25॥

《अर्थ 》→ वीर हनुमान जी! आपका निरंतर जप करने से सब रोग चले जाते है,और सब पीड़ा मिट जाती है।

 

संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥26॥

《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! विचार करने मे, कर्म करने मे और बोलने मे, जिनका ध्यान आपमे रहता है, उनको सब संकटो से आप छुड़ाते है।

 

सब पर राम तपस्वी राजा, तिनके काज सकल तुम साजा॥ 27॥

《अर्थ 》→ तपस्वी राजा श्री रामचन्द्र जी सबसे श्रेष्ठ है, उनके सब कार्यो को आपने सहज मे कर दिया।

 

और मनोरथ जो कोइ लावै, सोई अमित जीवन फल पावै॥28॥

《अर्थ 》→ जिस पर आपकी कृपा हो, वह कोई भी अभिलाषा करे तो उसे ऐसा फल मिलता है जिसकी जीवन मे कोई सीमा नही होती।

 

चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥29॥

《अर्थ 》→ चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग मे आपका यश फैला हुआ है, जगत मे आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।

 

साधु सन्त के तुम रखवारे, असुर निकंदन राम दुलारे॥30॥

《अर्थ 》→ हे श्री राम के दुलारे ! आप.सज्जनों की रक्षा करते है और दुष्टों का नाश करते है।

 

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता, अस बर दीन जानकी माता॥३१॥

《अर्थ 》→ आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है, जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते है।

 

राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा॥32॥

《अर्थ 》→ आप निरंतर श्री रघुनाथ जी की शरण मे रहते है, जिससे आपके पास बुढ़ापा और असाध्य रोगों के नाश के लिए राम नाम औषधि है।

 

तुम्हरे भजन राम को पावै, जनम जनम के दुख बिसरावै॥33॥

《अर्थ 》→ आपका भजन करने से श्री राम.जी प्राप्त होते है, और जन्म जन्मांतर के दुःख दूर होते है।

 

अन्त काल रघुबर पुर जाई, जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥34॥

《अर्थ 》→ अंत समय श्री रघुनाथ जी के धाम को जाते है और यदि फिर भी जन्म लेंगे तो भक्ति करेंगे और श्री राम भक्त कहलायेंगे।

 

और देवता चित न धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई॥35॥

《अर्थ 》→ हे हनुमान जी! आपकी सेवा करने से सब प्रकार के सुख मिलते है, फिर अन्य किसी देवता की आवश्यकता नही रहती।

 

संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥36॥

《अर्थ 》→ हे वीर हनुमान जी! जो आपका सुमिरन करता रहता है, उसके सब संकट कट जाते है और सब पीड़ा मिट जाती है।

 

जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करहु गुरु देव की नाई॥37॥

《अर्थ 》→ हे स्वामी हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझपर कृपालु श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए।

 

जो सत बार पाठ कर कोई, छुटहि बँदि महा सुख होई॥38॥

《अर्थ 》→ जो कोई इस हनुमान चालीसा का सौ बार पाठ करेगा वह सब बन्धनों से छुट जायेगा और उसे परमानन्द मिलेगा।

 

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा॥39॥

《अर्थ 》→ भगवान शंकर ने यह हनुमान चालीसा लिखवाया, इसलिए वे साक्षी है कि जो इसे पढ़ेगा उसे निश्चय ही सफलता प्राप्त होगी।

 

तुलसीदास सदा हरि चेरा, कीजै नाथ हृदय मँह डेरा॥40॥

《अर्थ 》→ हे नाथ हनुमान जी! तुलसीदास सदा ही श्री राम का दास है।इसलिए आप उसके हृदय मे निवास कीजिए।

 

पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रुप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥

《अर्थ 》→ हे संकट मोचन पवन कुमार! आप आनन्द मंगलो के स्वरुप है। हे देवराज! आप श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण सहित मेरे हृदय मे निवास कीजिए।

September 26, 2018

राधा कुण्ड

राधा कुण्ड

राधा कुण्ड और इसका महत्व


मथुरा से 26 किलोमीटर दूर राधाकुंड का अलग ही धार्मिक महत्व है।

प्राचीन मान्यताओं और ग्रंथों के अनुसार श्रीकृष्ण गोवर्धन में गाय चराने जाते थे अपने सखाओं के साथ ।

उनका सामना कंस के द्वारा उनका वध करने भेजे हुए कई राक्षसों से हुआ जिन्हें उन्होंने खत्म किया ।

इसी क्रम में अरिष्टासुर ने गाय के बछड़े का रूप रख कर श्रीकृष्ण पर हमला किया। इस पर श्रीकृष्ण ने उसका वध कर दिया।

तब राधारानी ने श्रीकृष्ण को कहा कि उन्होंने गौवंश के रूप में वध किया इसलिए उन्हें गौवंश हत्या का पाप लगा है।

इस पाप से मुक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने एक कुंड बनाया और सभी नदियों से आग्रह कर उनके पवित्र जल से कुंड को भर उसमें स्नान किया जो श्याम कुंड के नाम से प्रसिद्ध है ।

इस पर राधा जी ने श्याम कुंड के बगल में अपने कंगन से एक और कुंड खोदा और उसमें स्नान किया जिसका नाम राधा कुंड पड़ा । कंगन से कुंड बनाने की वजह से इसे कंगन कुंड भी कहा जाता है ।

अहोई अष्टमी पर पुत्र प्राप्ति स्नान :


मान्यता है कि राधा कुंड में कृष्ण भगवान और राधा जी ने सखियों सहित महा रास रचाया था इसी दौरान राधा जी से कृष्ण ने वरदान मांगने को कहा।

इस पर राधा जी ने कहा इस तिथि में राधा कुंड में जो भी स्नान करे उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हो। इस पर श्री कृष्ण ने राधा जी को यह वरदान दे दिया।

महारास वाले दिन कार्तिक मास की अष्टमी (अहोई अष्टमी ) थी। तभी से इस विशेष तिथि पर पुत्र प्राप्ति को लेकर दंपति राधाकुंड में स्नान कर राधा जी से आशीर्वाद मांगते हैं।

कार्तिक मास की अष्टमी (अहोई अष्टमी ) को राधा कुंड में हजारों दंपति स्नान कर पुत्र रत्न प्राप्ति की कामना करते हैं ।

ऐसी मान्यता है कि अष्टमी (अहोई अष्टमी )के दिन राधा कुंड में स्नान करने वाली सुहागिनों को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

इसके चलते यहां अर्ध रात्रि में स्नान किया जाता है इसलिए आज राधाकुंड पर देश से नहीं अपितु विदेश भी श्रद्धालु आते हैं।

मान्यता है कि कार्तिक मास की अष्टमी अहोई अष्टमी को वे दंपति जिन्हें पुत्र प्राप्ति नहीं हुई है वे निर्जला व्रत रखते हैं और रात्रि को पुष्य नक्षत्र में रात्रि 12 बजे से राधा कुंड में स्नान करते हैं।

इसके बाद सुहागिनें अपने केश खोलकर रखती हैं और राधा की भक्ति कर आशीर्वाद प्राप्त कर पुत्र रत्न प्राप्ति की आस करती हैं ।

इस दौरान आए हुए दंपत्ति स्नान करने के बाद एक फल (ज्यादातर पेठा फल ) राधा कुंड में चढ़ाते हैं और फल (पुत्र रत्न) की आस करते हैं ।

ऐसा माना जाता है कि राधा जी और भगवान कृष्ण रात्रि 12 बजे तक राधाकुंड में महारास करते हैं। इसके बाद पुष्य नक्षत्र शुरू होते ही वहां स्नान कर फल चढ़ाने वाले दंपति को पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है ।

अहोई अष्टमी को राधा कुंड पर अत्यधिक संख्या में देश विदेश के लोग स्नान हेतु आते हैं , जिनके बच्चे नहीं हुए वे फल की आस में स्नान कर फल चढ़ाने आते हैं ।

और जिनको आशीर्वाद प्राप्त हो चुका है वे फिर से स्नान कर अपनी आस्था अनुसार उनकी लंबी उम्र की कामना हेतु आते हैं । कुछ तो अपने पुत्र को साथ लेकर इस दिन राधा कुंड स्नान के लिए यहाँ आते हैं ।

[caption id="attachment_1148" align="alignnone" width="300"] Radha kund[/caption]

अहोई अष्टमी को स्नान सारी रात्रि जारी रहता है और लाखों की संख्या में श्रद्धालु राधे राधे का नाम जपते हुए भक्ति में लीन नजर आते हैं ।

बोल श्री राधे कृष्ण , जय श्री राधे

कैसे पहुंचें :


राधा कुण्ड उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले  के गोवर्धन में है अतः यहाँ पहुँचने के लिए सबसे आसान है कि पहले मथुरा पहुंचें जहाँ से गोवर्धन जाने के लिए निरंतर बस सेवा उपलब्ध है ।